मेरी पुस्तकें :शिव संदेश (अप्रकाशित)


                                                                        अध्याय -1 
                                                                         आराधन 
                                                                   -----------------------

 अंग अद्रि-बाल,शीश जह्नुजा लसै,तथापि, 
 विश्व में प्रसिद्ध योगिवृन्द में प्रवर हैं। 
आप हैं पुरान,यान हेतु वृद्ध बैल;किन्तु- 
 वास हेतु खोज लिये शैल के शिखर हैं।। 
नाम वामदेव,काम दाहिने समस्त,शम्भु- 
 दानवीर हैं परन्तु लोक कहे 'हर' हैं। 
'शुक्ल'के प्रणम्य चन्द्रशीश हैं,गिरीश जो कि, 
 अर्द्ध अंग नारि और अर्द्ध अंग नर हैं।। 1।। 


 कण हूॅ पवित्र विश्वरूप विश्वनाथ का व,
 शर्व महाकाव्य का पुनीत उद्धरण हूॅ। 
करता सदैव 'शुक्ल'शुद्ध आचरण;नीति - 
 न्याय,धर्म,ईश-भक्ति को किये वरण हूॅ।। 
दुष्ट ग्रहगण ! अब कीजिये दुसाहस न, 
 ग्रहण किये मैं चन्द्रचूड़ के चरण हूॅ। 
पूर्व जन्म,वर्तमान के विकर्म, भाग्य अंक! 
 क्रूरकाल! सावधान!शम्भु की शरण हूॅ।।2।।


एक ओर मोर यान स्कन्द का विराजमान,
 अन्य ओर व्याल फनकार फन फन है। 
गरल, पियूष कुण्ड,भूतगन,देवजन, 
 अर्क औ धतूर,मृत्यघाट राख धन है।। 
मूस पीठ पर गजमुख है सवार देखो, 
 एक थान पर बैल,सिंह गरजन है। 
परम विचित्र वस्तु संग्रह-सदन याकि, 
 भक्त मन मोहक भवेश का भवन है     ।।3।। 






पुष्प,पत्र,वारि से प्रसन्न हों पुरारि 'शुक्ल', 
 आशुतोष के समान देवता न अन्य हैं। 
नाम मात्र से कटें त्रिताप भक्त पाप कृत्स्न, 
 रोष में समस्त दग्ध दोष कर्म जन्य हैं।। 
पोष्य अन्तकेश से दुखी व दास हैं अनन्य, 
 मन्यता भरे असंत दुष्ट वृन्द हन्य हैं। 
धन्य शूल हाथ,धन्य शैलबाल साथ,धन्य-
अर्द्ध चन्द्र माथ,विश्वनाथ धन्य धन्य हैं  ।।4।।


आप पुण्य रूप,कर्म,ज्ञान,भक्ति हीन'शुक्ल'
 दीन हूॅ प्रसिद्ध विश्व पातकी महान हूॅ। 
दान, ध्यान,वेद औ पुरान में अजान,यज्ञ, 
 तंत्र,मंत्र आदि से सुविज्ञ भी अहा न हूॅ।। 

युक्त हूॅ अकार से,उकार से,मकार से न, 
 कौन से विकार के प्रवाह में बहा न हूॅ। 
मेट दीजिये तथापि भाग्य का कुलेख,क्योंकि, 
 अंघ्रि धूल का त्वदीय शम्भु!लेलिहान हूॅ।।5।। 





 भूति भस्म,भस्म काम,अंधकारि वारि शीश,
 पद्मजात विष्णु भी न जानते प्रताप हैं। 
पञ्च उत्तमांग के सितांग हैं कपूर तुल्य, 
 विश्वनाथ के विचित्र से कृया कलाप हैं।। 

माम हैं, न धाम,दामहीन,व्यालदाम,वाम- 
 देव,कामशत्रु,मेटते समस्त ताप हैं।
 पाणिचाप,चित्त में अमाप है कृपा,मदीय, 
 सर्वदाऽवलम्ब साम्ब चन्द्रचूड़ आप हैं।।6।। 


 मेटता ललाट का कुलेख,व्यालराट कण्ठ, 
 आदि अंत हीन,कभी वृद्धि है न क्षति है। 
भावसाध्य,बाध्य भक्त त्राण हेतु,धर्मसेतु, 
 देववृन्द का अराध्य,संत अंतगति है।।

 यान-गो,यमेश,योगयुक्त,यामअष्ट पूज्य,
 यातमान सेव्य, यज्ञरूप,यह्व,यति है। 
शुद्ध,शुभ्र,शान्त,शूल शस्त्र,श्रेय,शीश-इन्दु,
 'शुक्ल'का शुभेच्छ,शर्व,शैलसुता पति है।।7।।






ले रहा न नाम रूपी रतन अतन रिपु, 

 मन में मदन भव- भूति निज धन है। 
कीजिये क्षमा न ध्यान लाइये मदीय भूल, 
 दास पै अहेतुकी कृपा त्वदीय पन है।। 
कर्म-बन्ध,भाग्य का कुलेख,हस्तरेख किये- 
 त्रस्त हैं,न जानते कि विश्वनाथ जन है। 
सृष्टिजाल में फॅसा,धॅसा ममत्व गर्त मध्य, 
 सतत सकाम हूॅ,अकाम को नमन है।।8।।



 मेटते अनिष्ट,इष्ट अद्रि-बाल के,मदीय- 
 शीश आभरण,'शुक्ल'चित्त आहरण हैं।
 क्षरण करें जो कर्म कुफल,हरें विपत्ति, 
 मोह संवरण,सृष्टि सिंधु संतरण हैं।।
 देववृन्द पायक,प्रदायक विमुक्ति के जो, 
 देखते कभी न पाप,पुण्य विवरण हैं।
 पाथजात तुल्य रम्य,गाथ है अगम्य,मम, 
 ध्यान में सदैव चन्द्रचूड़ के चरण हैं।।9।।




अष्टमूर्ति रूप रम्य चित्त में बसा मदीय,
 कष्ट काल में सदा स्मरामि क्लेशहं हरम्। 
लोक पाश में बॅधे सुनो असंख्य लोग 'शुक्ल'
 लो परेश नाम पूत तीर्ण सृष्टि नश्वरम्।। 
दीन की पुकार आशु आपने सुनी दयालु, 
 पूर्णकाम! सद्य पूर्ण कामना हुई परम्। 
धन्य हैं भवेश आप,आप तुल्य हैं;अहं, 
 नमामि चन्द्रशेखरं,नमामि चन्द्रशेखरम्।।10।। 





 विश्व वन्द्य अहह अहेतुकी कृपालु, बन्द- 
 ज्ञान चक्षु खोल दिये 'शुक्ल'से अधम के। 
शोभित मसान मध्य,नृत्य में सतत रत, 
 संग संग शब्द घनघोर डम डम के ।। 
मूर्तिमान ज्ञान,यान मुक्ति पंथ के, 
अमान- ध्यान किया जिसने उसी के भाग्य चमके।
 काम क्रोध तम के विदारक तमारि सम, 
 चरण मनोज्ञ अद्रिबाल प्रियतम के।।11 ।। 



 धरते न चित्त में भवेश भक्त भूल कभी, 
 नाम लिये पातक समस्त हर हरते। 
ध्यान करे 'शुक्ल'भूति भूषित सुदेह का जो, 
 तस्य गेह भूति से स-नेह भव भरते।।
 अंतकाल लेकर पवित्र विश्वनाथ नाम, 
 वामदेव दास भवजाल से उबरते।।
 रहता न क्लेश लेश,सम्पदा अशेष मिले, 
 रञ्च मात्र जिसपै महेश कृपा करते।।12।।




भक्त मन मीन को अथाह अम्बु राशि तुल्य, 
 'शुक्ल'चित्त चातक पवित्र बूॅद स्वाति के। 
सर्व त्यक्त, परम अशक्त,खर्व दास हेतु, 
 सुलभ बनाते विश्व भोग भाॅति भाॅति के।। 
ध्यान से मनाक नाक ईश बन जाते म्लेच्छ, 
 पातकी,पुलिन्द,हूॅण,शूद्र निम्न जाति के।। 
सिद्धि के सदन,षट वदन,गणेश वन्द्य, 
 संसृति कदन,पद मदन अराति के।।13।।




 नगराज बालिका विराजती सु-वाम अंग, 
 नग पर धाम किन्तु रहता नगन है। 
ज्ञान का स्वरूप किन्तु रहता आजान तुल्य,
 षट भगवंत किन्तु भोगता भग न है।। 
योग नीद रत है सजग जग तस्य रूप, 
 जगत निवास किन्तु मन में जग न है। 
उसके हैं ध्यान में मगन 'शुक्ल'-चित नित, 
 और वह भक्त हित ध्यान में मगन है।।14।। 



 भानुमंत,माथ में सुशोभित मयंक नित्य, 
 मंगल प्रदायक प्रणाम!त्रिनयन है। 
बुध जन वंद्य,विश्व गुरु,शुक्र सा महान् - 
 कवि;करता त्रिताप नाश निवसन है।।
 धूमकेतु भाल मध्य,स्थाणु है सतत ध्रुव, 
 नाम से सदैव दूर भागता अतन है। 
चौदहों अनन्त, द्वीप सप्त, ऋषि,मुनि पूज्य, 
 देखिये महेश में खगोल का सृजन है।।15।।




केश गंग पूत,कृष्ण व्याल कण्ठ ,काशिराज, 
 परम विचित्र वीर्यवान पञ्चशिर है।
 भाल में धनञ्जय,स्व-भक्त टेर भूरिश्रवा, 
 पाञ्चजन्य दोष अंधकार को मिहिर है।। 
नमित सुरेश सहदेव शकुनी महान्,
 'शुक्ल'शिखण्डीय देह,धीर युधिष्ठिर है।
 धर्मराज,ईश,भीमविग्रह,विराट देखो, 
 शैव्य वन्दना कि कुरुक्षेत्र का शिविर है।।16।।





 औषधीश नाम विश्व रोग हेतु रामवाण,
 ध्यान भक्तवृन्द के त्रिदोष का निदान है। 
दूज का मृगाङ्क माथ,भोग से विरक्त,चाप, 
 शूलपाणि,जीव जीवनी जड़ी समान है।। 
मेटता अरिष्ट,दुष्ट वर्ग गर्व चूर्ण पूर्ण, 
वर्ण स्वच्छ स्वर्ण भस्म अंग भंग पान है।
है सुदर्श नागहार का सदा ज्वरान्तकार, 
मार शत्रु वन्दना कि वैद्य की दुकान है।।17।।



 चित्त के प्रदेश में महेश मूर्ति मञ्जु बनी, 
 भाव पुष्प कविता मदीय अद्रिबाला है।
 नन्दित सदैव हूॅ विराजमान नन्दीगण, 
 कुण्डलिनी शम्भु कम्बु कण्ठ सर्प काला है।। 
विन्दुथान का सहस्र पत्र पद्म छत्र तुल्य, 
 गुम्बज सु-शीश,केतु कीर्ति का निराला है। 
ज्ञान ज्योति आरती,मुखारविन्द द्वार अहो,
'शुक्ल'का शरीर ज्ञात हो रहा शिवाला है।।18।।




शरद निशाकर सम शुभ शीतल,
 शमन त्रिताप,शीश गंगाधर। 
सरल स्वभाव,तरल अति हीतल, 
 गुणातीत शिव शिर दोषाकर।।
 सगुण, सतत रत दान,मदन रिपु, 
 नारायण प्रिय,जयति उमावर। 
वरद,विनीत,अमर,दिति देवर, 
विश्वम्भर,शंकर,हे हर हर ।।19।। 



शंकर,शशांकशीश,शम्भु,शिव,शूलपाणि,
शशिशिर,शैलजेश,शर्व,शाम्भवी के पति। 
कण्ठ कालकूट,कामकदन,कपाली,काली- 
कंत, करुणाकर,कपर्दी है कृपालु अति।।
भूतनाथ,भव्य,भव,भस्म-अंग,भालज्वाल, 
 भीम,भवतारक, भवेश,भक्त-अंतगति। 
चैलहीन,चण्ड,चिन्त्य,'शुक्ल'-चित्त चिन्तामणि, 
 चन्द्रचूड़ चारु अंघ्रि युग्म में मदीय रति।।20।।







 चन्द्रमा ललाट,तारकेश अवतंस,विधु- 
 मस्तक,विभूषण मयंक,मौलि द्विजवर। 
सतत जटाकलाप मध्य हैं कलानिधान,
 शीत रश्मि शेखर,चकोर बन्धु प्रियतर।।
 क्षणदेश मण्डित,पयोधि-सुत संग नित्य, 
 राजत सुधाकर कपर्द,अर्द्ध शशिधर। 
बाल इन्दु भाल है,सुशोभित निशीश शीश, 
 नमन निशीथनाथ-माथ,चन्द्र शिर पर।।21।।



देव,पितृ,अर्यमा उपास्य हैं किन्हीं के और, 
 कुछ जन हेतु पूज्य गंग मातु धारा है। 
कुछ के प्रणम्य राम,कृष्ण हैं विशेष,शेष, 
 शारदा किन्ही की औ किन्ही की विष्णु दारा है।। 
लौकिक जनों का अवलम्ब कुछ लोग लेते, 
 होत क्षुब्ध देख जिसे हृदय हमारा है।
 लाभ हो कि हानि,सौख्य प्राप्त हो कि संकट ही, 
 'शुक्ल'को सदैव चन्द्रचूड़ का सहारा है।।22।।





कोई अवलम्ब और शेष है भवेश नहीं, 
 आश है कि काज आशुतोष ही बनायेंगे। 
अन्धक उधारा जोकि पातकी प्रसिद्ध ही था, 
 चन्द्रचूड़ कौन व्याज 'शुक्ल' को भुलायेंगे।। 
पतित जनों को आप नित्य हैं उठाते नाथ, 
 फिर किस भाॅति इस दास को गिरायेंगे। 
लाभ दें कि हानि,मुझे आनन्द कि दुःख ही दें, 
 हर विधि तात आप मेरे मन भायेंगे ।।23।। 


 अर्द्धनारि ईश,अर्द्ध चन्द्र शीश,आप्तकाम, 
 नाम मात्र से असंख्य पातकी अधी तरे। 
पञ्चवक्त्र,पञ्चवक्त्रभामिनी प्रिया प्रसिद्ध,
 पञ्चवान शत्रु,भाल पञ्चवक्त्र हैं धरे।
 भक्त का अभाग लेख मेटते दयालु आशु, 
 बुद्धि और इन्द्रियादि से सदैव हैं परे। 
याद तू करे न अन्य को अरे विमूढ़ 'शुक्ल',
 भक्ति भाव चित्त में भरे करे हरे हरे ।।24।। 





कण्ठ में गरल,गंग जल शिर पर,हर - 

 कर लिये डमरु,त्रिशूल,अजगव हैं। 
वन्दन निरत विधि,माधव प्रणत,नत- 
 सिद्ध मुनि,वेद के स्वरूप हैं,प्रणव हैं।
 रज के सदृश जिन्हें भव का विभव,भव,
 पुरुष पुरातन तदपि नित्य नव हैं। 
शव की विभूति से विभूषित धवल तन, 
 जन की शरण शैल बालिका के धव हैं।।25।।



लंक व्याघ्र चर्म है सुग्रीव में कपाल माल,
 धारते कराल भाल ज्वाल विभीषण हैं। 
लषन कठोर शत्रु दमन प्रवीण,विश्व- 
 जनक,सु-नील कण्ठ शैलजारमण हैं।।
 त्रिभुवन भरत,प्रताप भानु कोटि तुल्य, 
 सरल व शिष्ट,सृष्टि कारण करण हैं। 
परम विचित्र कूट,स्थाणु हैं,सर जूट देखो, 
 राम की कथा है याकि शम्भु गुणगण हैं।।26।।



 जिससे विहीन होती सृष्टि की न संज्ञा कहीं, 
 अव्यय,न यस्य कभी वृद्धि या क्षरण है।
 निर्गुण अनाम,कर्ता,कर्म, सर्वनाम रूप, 
 भव्य छवि,भक्तिगम्य,मोह संवरण है।। 
भालज्वाल,शीशवारि,देखिये विचित्र संधि, 
 स्वर्ण वर्ण,मालमुण्ड,सोम आभरण है।
 'शुक्ल'ने विशेषण समास ही बखान किये, 
 शंकर शरीर में समस्त व्याकरण है।।27।। 






 कुछ इस भाॅति के विकर्म हैं रहे कि नाथ,
 दिवस समस्त शान्ति से विहीन ही जिये। 
अंध्रि युग्म में त्वदीय प्रणत परेश 'शुक्ल'
 परम कृपालु शम्भु त्वरित पसीजिये।। 
हर बार हरते विपत्तियाॅ रहे त्वमेव,
 हर!इस बार भी कुयोग दर दीजिये। 
कर दीजिये समस्त भाल के कुअंक नष्ट, 
 एक बार और दास हेतु कष्ट कीजिये।।28।।



दुखित रहा हूॅ कष्ट पीड़ित अपार शम्भु, 
 शम्भु नाम लूॅगा,मिल जायगी अवश्य शर्म। 
नीति धर्म त्राता,विधि विष्णु के विधाता,शिव, 
 मेरे उर मध्य सदा उनका पवित्र हर्म ।। 
भाग्य के कुअंक,विधि के विधान सावधान! 
 धारण किये हूॅ'शुक्ल'चन्द्रचूड़ नाम वर्म।
 फलित न होंगे,होना गलित पड़ेगा उन्हें, 
 होके रहेंगे ध्वस्त मेरे पूर्व कृत विकर्म।।29।। 


 शम्भु, शम्भु, शंकर, शशीश हूॅ पुकार रहा, 
 भावी के कुभाग्य गर्त झट पट जायेंगे।
 कट जायेंगे समस्त पूर्व कृत मेरे पाप, 
 प्रतिकूल विधि के विलेख फट जायेंगे।। 
भक्त-भीर-हारी!हे कृपालु!करुणा के सिंधु! 
 संकट मदीय देख कैसे नट जायेंगे। 
शीघ्र सुन लूॅगा नष्ट हो गया कुयोग कृत्स्न, 
 मेरे गेह शम्भु के प्रसाद बट जायेंगे।।30।।




गत सब समय व्यतीत दुखमय हुवा, 
 वय कटी विपति दुसह सह सह के। 
उर के प्रदेश में परेश का विग्रह शुचि, 
अब न अधीन मैं किसी भी क्रूर ग्रह के।। 
काल की अशुभ रचना से बच जाऊॅगा मैं, 
 ध्यान मध्य शिव के समीप 'शुक्ल' रह के। 
विधि का विधान,क्रूर कठिन ललाट लेख, 
काट दूॅगा सहज में शम्भु शम्भु कहके।।31।।





शीश अर्द्ध चन्द्र वरदायी है निराला रूप, 
 वाम विश्वमातु लसी सर्वदा अमन्द हो। 
भूषण भुजंग'शुक्ल'मति राम रस लीन, 
 मानस विहारी काट देते भव फन्द हो। 
जगन्नाथ दास को सदैव अनायास आप, 
 करते प्रदान भव भूति घनानन्द हो।
 सुत देव सेनापति जय जय शंकर हे!, 
 चन्द्रचूड़ अंक में समेटे कवि वृन्द हो।।32।। 










 पाॅच हैं वदन,एक रदन सुपुत्र 'शुक्ल', 
 सौम्य चित्त,यज्ञ धूम,आपके सदन हैं।
 पट न कहीं हैं,तन घोर,भूतगन भृत्य, 
 ऐसे निधनञ्जय मदीय मञ्जु धन हैं।। 
आशुतोष मेटते विकर्म का प्रभाव कृत्स्न, 
 रक्षित सदैव भवदीय भक्त जन हैं।
 कण्ठ सर्प,पल में किया चूर्ण कंदर्प दर्प, 
 अर्पण भवेश तुम्हें भाव के सुमन हैं।।33।।






गर्द है मसान की शरीर,शीश गंग नीर, 
 अर्द्ध अंग मर्द और अर्द्ध अंग नारी है। 
तप्त रुक्म देह में कहीं न वस्त्र,गेह हीन,
 हुक्म चन्दूचूड़ का त्रिलोक मध्य जारी है।। 
कोई दगादार,भेंट चाहता अपार कोई,
 कोई कहीं चाह रहा साधना करारी है। 
कोई किसी भाॅति कभी भक्त को पड़ा हो काम,
 काम के अराति की प्रसिद्ध वफादारी है।।34।।


 सतत प्रवाहमान शीश गंग धार दिव्य, 
 शोभित ललाट में मयंक मञ्जु आधा है। 
भक्ति है अगाधा उन शम्भु चरणों में और, 
 उनको ही नित्य क्लिष्ट काल में अराधा है।।
 साध्य! कर देना क्षमा लौकिक हितों के हेतु, 
 मैने बाध्य होके हर बार तुम्हें साधा है। 
कुछ इस भाॅति की रही है भवदीय कृपा, 
 जिससे कहीं भी 'शुक्ल'कार्य में न बाधा है।।35।। 



पल में विमुक्त कर देते संकटों से और,
 भौंर पड़ी भक्त की सदैव नाव खेते हैं। 
करते प्रदान झट दास को विभूति षट,
 बिल्व पत्र से ही चित्त मोद भर लेते हैं।। 
भाव मात्र चाहते न भूख भोग की कदपि, 
 दीन को सदा अबोध बाल तुल्य सेते हैं। 
देखो आशुतोष की उदारता अपार अहो! 
 'शुक्ल'के समस्त शम्भु कार्य कर देते हैं।।36।।





सन्त वृन्द वन्द्य,सदा जिनकी बड़ी है पूॅछ, 
 अर्क लील जाते,रुद्र विकट महान हैं। 
राम के गुलाम,किया विजित मकरध्वज, 
 विरज खचर प्रिय,अति बलवान हैं।।
 लंक में निपट मोद देते राघवेन्द्र को हैं, 
 अनृत न वातजात मूर्तिमान ज्ञान हैं। 
बनक विचित्र,भीम रूप हैं कनक मुख, 
 अर्द्ध चन्द्रचूड़ हैं कि वीर हनुमान हैं।।37।। 






बाॅधे जटा जूट शिर वन विचरण,तन- 
 वलकल पट न,सुहृद लंक ईश को।
 भूतनाथ चित्रकूट गिरिजाहि प्रिय नित्य, 
 पञ्चमुख मुदित विलोक के कपीश को।।
 फणिराज प्रिय'शुक्ल'सतत सुकण्ठ नील,
 देके दरशन देते सुख जानकीश को। 
श्याम स्वर्ण वर्ण,बलीमुख ऋच्छपति संग, 
 लखता हूॅ राम में किशोर चन्द्रशीश को।।38।।



अन्तवन्त जीव एक कलुष निबद्ध त्रस्त,
याचक रहा हूॅ हे अनन्त!कृपाकोर का। 
मानता हूॅ आर्ति मेरी कर्म अनुहार ही है, 
 ज्ञात है प्रसिद्ध ज्ञान कृष्ण रणछोर का।। 
किन्तु क्या नहीं है सत्य ध्वस्त कर देता कृत्स्न, 
 पाप,एक सौम्य दृष्टिपात भक्त ओर का। 
नित्य अवलम्ब मुझे 'शुक्ल'गिरिशन्त ऐसे, 
 सन्त-चित्त-मोर-मेघ अमल अघोर का।।39।। 



                                     -----------------------प्रथम अध्याय पूर्ण हुवा -------------------


                                                                      अध्याय-2

                                                     -----------------आवाहन ------------------- 



चन्द्रकूट शैल शिखरस्थ शिवा मन्दिर में,
 भक्ति से झुकाया 'शुक्ल'शीश बार बार है।
अम्ब अपमान से दुखी हूॅ हत-शान हुवा,
 शेष महिमा न पहले सी ;हुई हार है।।
 गान करूॅ शम्भु की कृपा का करुणा का मातु,
 दान में बड़े हैं वीर,शक्ति भी अपार है।
बोलीं मुसकाके माॅ, लगाके हृदयस्थल से,
 धन्य हो सुपुत्र बड़ा सुन्दर विचार है।।1।।



 सरल बड़े हैं सुत शीघ्र ही प्रसन्न होते,
 जन उपकारी आशुतोष नाम धारी वे।
अर्चना विधान अति सुगम,न कष्ट साध्य,
 भाव से प्रसन्न होते भक्त हितकारी वे।।
बेल पत्र पावन मदार पुष्प पात से ही,
 मुदित महेश होते जगत मदारी वे।
 गान करो हर के गुणानुवाद,कर देंगे,
 सत्वर प्रदान पूर्व महिमा तुम्हारी वे।।2।।


श्री केदारनाथ जी 






शीश गंग पानी है,कहानी जिनकी विचित्र,
 भव हैं,भवेश,प्रिय धव हैं भवानी के।
 मूर्तिमन्त ज्ञानी हैं,न सानी बल विक्रम में,
 यानी अद्वितीय,शत्रु पञ्चवान मानी के।।
महिमा बखान करे कौन?हक्के बक्के शेष,
 छक्के छूटते हैं 'शुक्ल' शारदा सयानी के।
 अकथ असीम परे वानी से,सुचिन्तनीय,
 किस भाॅति गाऊॅ गुण अवढर दानी के।।3।।



चकित विधाता,चित विस्मित हैं विश्वत्राता,
 शेष सहमें से,सकुची सी गिरा मौन है।
 देख देख सद्गति हीन,दीन दुखियों का, 
 वैभव विभूषित सुरेश तुल्य भौन है।।
 क्योंकर?लिया था शिव नाम 'शुक्ल'एक बार,
 भक्ति से; समस्त पाप पुञ्ज किया गौन है।
 दान के विधान में,विमुग्धमान अविलम्ब- 
 होने में;सुकीर्तिवान उन सम कौन है।।4।।


श्री केदारनाथ जी 





हे मयंकमाथ! हूॅ अवश्यमेव भाग्यहीन, 
 तात ज्ञात हो रहा मदीय पुण्य कम हैं। 
थम थम बार बार आ रहा विपत्ति भार, 
 क्लेश-जाल से न है उबार, नैन नम हैं।। 
भूल था गया तुम्हें,विहाल हूॅ,लिया सुनाम, 
 शम्भु हे!निहाल करो,आप तो सक्षम हैं।
 कोटि जन्म पाप,कर्म के कुलेख मेटने में, 
 कोऽपि है न आप तुल्य,नाथ अनुपम हैं।।5।।



रचित उन्ही का सृष्टि जाल है समस्त और,
 रूप शर्व ही के विधि पन्नगारिगामी हैं।
 पल पल पर आधिपत्य है उन्ही का सदा,
नभ जल मध्य ,हर उर थल यामी हैं।।
 स्वयम् अकामी,पूरी कामना समस्त करें,
 दास की;प्रदान करने में बड़े नामी हैं।
 भोग में न लिप्त,भोगी कण्ठ से लगाये कृष्ण,
भसम लगाये'शुक्ल'त्रिभुवन स्वामी हैं।।6।।


कनक मदार भी सभक्ति यदि कोई भेंट,
करता तो काट देते कर्म बंध सारे हो।
 छनक लगातो हो न,धाते भक्त टेर सुन,
दास की सुरक्षा का पवित्र व्रत धारे हो।।
सनक सवार है न होगा उसे क्लेश रञ्च,
शरण शिवा की जो भी,आपके सहारे हो।
 भनक पड़े जो कान मेरा स्वर आर्तिमान,
गरिमा दिलाना वही जनक हमारे हो।।7।।



श्री सोमनाथ जी

ओक हैं कहीं न,हीन वस्त्र से अशोक नित्य,
मॅूद नैन मैन शत्रु सृष्टि को सम्हाले हो।
शीश बाल जाल,मुण्डमाल है,मयंक भाल,
विश्वपाल,कण्ठ में कराल व्याल काले हैं।।
 देह में मसान धूल,पाणि में त्रिशूल,
शूल- भक्त के विनाश करें आशुतोष आले हैं।
 भूल से' शिवेति' जो कहे कृतार्थ हो तुरंत,
'शुक्ल'चन्द्रचूड़ तीन लोक में निराले हैं।।8।।


शिखर हिमाद्रि का निवास उनका है नित्य,
 किस भॉति देखो विश्वनाथ ससुराली हैं।
 हिमगिरजाता जाह्नवी को शीश धारे हुए ,
भगिनि शिवा की 'शुक्ल'शम्भु प्रिय साली हैं।।
 भाभी कमला के भ्रात,सिन्धुजात,चन्द्रमाथ,
अर्द्धनारि,बाम अंग शशिमुख वाली हैं।
नटराज नृत्य में प्रवीण हैं,नचाते सृष्टि,
कामशत्रु होके कैसे रसिक कपाली हैं।।9।।



पहॅुच गया है एक याचक समीप देखें,
ध्यान हैं रमाये भला कैसे सुधि लेते हैं।
दीन सा प्रतीत होता,दास है शिवा का 'शुक्ल',
नमन किया है शीश टेक,शम्भु चेते हैं।।
 'होता ज्ञात पातकी' भले ही हो न चिन्ता कुछ',
 ' क्यों ?' 'हैं करुणाकर'प्रभु अंक भर लेते हैं।
 विधि के विलेख,लेख भाग्य के न देखे सखी,
 देखो देखो शैलजे! त्रिलोक दिये देते हैं।।10।।


हाकिम त्रिलोक के विराजे न्याय कक्ष आज,
देखें सखि होता किस भॉति काम काज है।
आया दीन एक देखो की है फरियाद कुछ,
कहता बड़ा ही प्रभो!भूमि पै कु-राज है।।
 विधि ने हिसाब खोला,विधि की किताब पेश-
करके;लगाया एक लम्बा ऐतराज है।
 'दास है शिवा का,मम नाम ले चुका सभक्ति,
प्राप्त हो अभीष्ट'रखा शिर पर ताज है।।11।।


श्री सोमनाथ जी


एक बार भूल से भवेश नाम ले जो उसे,
देते भव, भव की परीक्षा में समस्त अंक।
'शंकंर' पुकार दे सभक्ति तो भला क्या फिर,
कर्म बंध,विधि के विधान से रहे निशंक।।
 'शिव'शुभ शब्द की शकार मुख आते क्षण,
छिन्न यम नियम ठगे से रह जाते कंक।
कुपित परेश हों तो रंक तुल्य राव बने,
मुदित महेश हों तो राव बन जाय रंक।।12।।



चार वेद,सकल पुराण,सर्व धर्म ग्रन्थ,
योग,जप,यज्ञ का'शिवेति'नाम सार है।
 एक बार टेक दे स्वशीश जो पदों में भक्त,
 होती भव मध्य कभी उसकी न हार है।।
 नाम ले ले नकद कि याद ही करे सप्रेम,
नेम,व्रत,कर्मकाण्ड सकल उधार है।
 मार शत्रु!महिमा मदीय पूर्व दे दो नाथ!
ले लो प्रभु!पेश 'शुक्ल'करुण पुकार है।।13।।


विमल हुवा है चित्त,हृदय कमल स्वच्छ,
प्रकट प्रभाव शीश सुरसरि जल का।
भस्म हुईं आसुरी प्रवृत्तियॉ,कु-संस्कार,
क्यों?कमाल है तृतीय नेत्र के अनल का।।
मृत खल भाव पूर्ण,कुकृत कुफल सर्व,
ध्यान से प्रचण्ड रुद्र कण्ठ हलाहल का।
किन्तु हे महान् शम्भुयान!घनानन्द दान,
क्यों किया न?नाथ का प्रभाव क्यों न झलका?14।।


भाग्य चक्र आज सानुकूल है न शीश ताज,
हो ही जायगा उबार शर्व ध्यान धार के।
क्रूर कर्म के कुयोग से विमुक्ति पा सकॅूगा,
कल्पना में 'शुक्ल' नागहार को निहार के।।
हार को उतार,जीत- हार कण्ठ धार लॅूगा,
भाव लोक में भवेश आरती उतार के।
हॅू घिरा हुवा विपत्तियों से मैं अवश्य किन्तु,
पार ही लगॅूगा शम्भु नाम को पुकार के।।15।।

श्री मल्लिकार्जुन जी


खल समुदाय था लगाये घात,मात हुई,
त्राहि तात!अब तो हमारी ओर हेरिये।
 घिर सा गया हॅू भाग्य,कर्म जन्य संकट के-
जाल में;मयंकभाल! कष्ट को निवेरिये।।
 षडयंत्रकारी पाप ग्रह हैं दिखाते ऑख,
सहम गया हू्ं नाथ!नयन तरेरिये।
प्रतिकूलतावों को परास्त कर दो दो हाथ,
दॅू कस दो हाथ,हथ आप शीश फेरिये।।16।।



चन्द्र की छटा पवित्र,वारिधार दिव्य शैल-
बाल हैं,जटाल,यहॉ ध्यान है मनन है।
 खेल रहा मूस देखो बैल से मगन ओह!
गज सिंह में न द्रोह,मोह न मदन है।।
विद्यमान सुमन सुदरशन हेतु,फल,
सुलभ समस्त मस्त व्याल फनफन है।
 गदगद मन कवि को है बड़ा उहापोह,
शम्भु बैठे सकुल कि शान्त तपोवन है।।17।।


छल षडयंत्र स्वार्थ प्रेरित कुचक्रपूर्ण,
हमला हुवा है किन्तु हिम्मत न हारूंगा।
हरि को हिये में धार,अंतस्थल में निहार,
आई भीर शम्भु गान ध्यान से निवारूंगा।।
 मन का मिला के तार,शिव से कहॅूगा तार,
तार;तार तार कर अशुभ विदारूंगा।
 सबल जनों ने इस लोक के किया अन्याय,
न्याय हेतु तीन लोक नाथ को पुकारूंगा।।18।।



अंगीभूत शम्भु से हुवा जो सुधा प्लावित है,
कोप से प्रभावित हो,काम है अनंगीभूत।
संगीभूत शैल की सुता भी कितनी दयार्द्र ,
विभव लुटातीं आप रह के असंगीभूत।।
भंगीभूत यज्ञ,पुर, अंधक सरोष किये,
कितने निहाल भव भंग में उमंगीभूत।
 रंगीभूत 'शुक्ल'भाव भरित सुभक्ति से हो,

वरद पसारे हाथ मुदित तरंगीभूत।।19।।



पानी है पवित्र जह्नुजा का शीश;पानीदार, 
 आप भक्त काम में;सु-बाम में भवानी है। 
माॅग गये पानी पुर, काल,काम जैसे वीर, 
 धीर गज मारा,हारा दक्ष अभिमानी है।। 
आशु आप होते पानी पानी सुन भक्त टेर, 
 कण्ठ तक पानी,तात!बात क्या न जानी है? 
चढ़ क्यों रही है शत्रुवों पै शान शम्भु आज, 
 उतर रहा क्यों सेवकों का 'शुक्ल'पानी है?।20।।


श्री मल्लिकार्जुन जी


पानी भरते हैं यम वरुण कुबेर आदि, 

 आप के प्रताप की तो अकथ कहानी है। 
पानी पिलवाया जलंधर को संगर में, 
 आज भी अनंग पड़ा कामदेव मानी है।। 
माॅगे कुछ सेवक तो पानी पर चढ़ जाते, 
 देते भला क्या न, कौन आप तुल्य दानी है। 
कण्ठ तक पानी,पानी आनन का मन्द पाहि!
 हे त्रिनैन त्राहि!पाद्य हेतु नैन पानी है।।21।।


पतित अवश्य हूॅ प्रभो!मैं किन्तु देखा तुम्हें, 
 विष्णु पद पतिता को शिर पर धरते। 
दोष कोष हूॅ अवश्य मानता हूॅ आशुतोष, 
 दोषाकर तो त्वदीय शीश पै विचरते।। 
सकलंक शुक्ल भाल,मैं भी सकलंक 'शुक्ल',
 भोगी हूॅ,न भोगी कभी कण्ठ से उतरते। 
हर!हर भाॅति हूॅ तुम्हारे योग्य दीनानाथ, 
 हरते विपत्ति क्यों न अंगीकार करते।।22।।


देव,यक्ष,दानव,मनुष्य,नाग,किन्नरादि, 
 मान रहे शंकरीय सार्वभौम सत्ता को। 
चाहें तो पिपीलिका से पील भी पराजित हों, 
 अनचाहे दिग्गज हिला न सके पत्ता को।। 
चन्द्रचूड़-दत्ता दयानिधि से निहाल हुए, 
 कितने न देखे बिन कर्म गुणवत्ता को।
 पुष्षदन्त,रावण,कवीश,कालिदास,व्यास, 
 सम्यक् न जान सके शम्भु की महत्ता को।।23।।

हरता हिये का तम,करता प्रकाशमान, 
 विमल बनाता 'शुक्ल'अंतस्थल काला है। 
भक्त के त्रिताप कर शमित भली प्रकार, 
 शैत्य,शान्तिदाता दिव्य सुखद निराला है।। 
कुमुद समान साधना के ध्यान के विकास, 
 करने में अद्वितीय है,अनूप आला है। 
शैलराजबाला के विनोद का मसाला,शम्भु- 
 शीश शुभ्र शोभित शशाॅक का उजाला है।।24।।


श्री महाकाल जी की भस्म आरती


लह लह हिय में हिलोर यह कौन दिव्य, 

शम्भु शीश शोभिता सुरापगा लहर है। 
दह दह हो रहे कु-संस्कार क्षार क्षार, 
 स्थाणु के तृतीय नेत्र ज्वाल का कहर है।।
 रह रह कौंध रही भव्य यह कौन ज्योति, 
 ध्यान से सु-भासमान अंतर्दहर है।
 कह कह कौन रहा रह रह हर हर ,
 शैलबाल स्वर 'शुक्ल'श्रवण कुहर है।।25।।



देखता हूॅ ध्यान में विराजमान काशीपुरी, 
 सृष्टि का चलाते आप राज्य एक छत्र हैं। 
पाॅच विप्र सस्वर रहे हैं कर रुद्री पाठ,
 'शिव शिव'गूञ्ज भरी,जप ,यज्ञ सत्र हैं।। 
सूक्ष्मवेषधारी सुर नमन रहे हैं कर, 
 किन्नरादि विनत सभक्ति यत्र तत्र हैं।
 ले लो नाथ:जय हो तुम्हारी विश्वव्यापी नाम,
 कामशत्रु!सप्रणाम भेंट बेलपत्र हैं।।26।।



व्यालहार!काल है कराल आज मेरे प्रति, 
 आ गया त्वदीय पास हार के,विचार के। 
ताल मार के युयुत्सु हैं खड़े अराल ऋच्छ, 
 साल हैं रहे विकर्म उग्र रूप धार के।। 
जाल में फॅसा,कुचाल त्रस्त हूॅ खलों की नाथ! 
भालचन्द्र!हो उबार नाम को पुकार के। 
शब्द,ताल,भाव-जाल-बद्ध पद्य विश्वपाल! 
 भेंट हैं सप्रेम पुष्प,पात ये मदार के।।27।।



श्री महाकाल जी 


विश्वरूप!व्याप्त आप हैं समग्र में सदैव,
हे कृपालु!क्यों सुना न भक्त की पुकार को? 
ज्ञात हो सकी न भक्त भीर हे भवेश!स्यात् , 
ध्यानलीन हो,न ध्यान दे रहे गुहार को।। 
डूब क्यों रहा प्रवाह चक्र में कुकाल के 
प्रणाम!पा महेश आप तुल्य कर्णधार को।
 कष्टभार त्रस्त,चाहता कृपा फुहार नाथ, 
 टेर के सशक्ति मैं 'श'कार को 'व'कार को।।28।।



विश्वनाथ नाम लिया,जिसने प्रणाम किया,
 पातक समूह की समूल क्षति हे गई।
 ध्यान किया जिसने स्वरूप शंकरीय दिव्य, 
 ज्ञान ज्योति से सुभासमान मति हो गई।। 
अर्चना विधान किये,फूल,पत्र भेंट दिये, 
 तो सुरेश आदि को अगम्य गति हो गई। 
धन्य उन्हीं पार्वती पति पद पंकजों में, 
 'शुक्ल'की अनन्य भक्ति,अति रति हो गई।।29।।



विभव हमारा अपहरण हुवा है नाथ, 
 गरिमा गिरी है आप भुवन भरण हैं।
 उलझ रहा हूॅ आर्ति जाल में विकर्मजन्य, 
 निःसहाय; दीनबन्धु दीन की शरण हैं।। 
विश्वसिंधु है,अपार है लदा कुभाग्य भार, 
 ध्यान पुष्ट पतवार,यान श्रीचरण हैं।
 कारण,करण कृत्स्न कलुष क्षरण,सर्व-
 संकट हरण,शर्व,शैलजा वरण हैं।।30।।


ढाये देत दुर्ग दुष्ट कूट चिन्तकों के,कोट-
 कुटिल कुचक्रकारी जन के हिलाये देत। 
लाये देत सुन्दर सुयोग के मुहूर्त मञ्जु, 
 कठिन कुयोग,घटी, वार ही बिलाये देत।।
 खाये लेत अंतःदुख तमस 'शिवेति'सूर्य, 
 शिर शशि ध्यान हिय कमल खिलाये देत। 
भक्त को भवानीपति भावित हो भाव से ही, 
 भूतकाल वाली भव्य महिमा दिलाये देत।।31।।



श्री भीमाशंकर जी


सतत पुकार ही रहा हूॅ,वार बीते बहु, 
 ध्यान ही दिया न,या कि शम्भु मग्न ध्यान हैं। 
कष्ट ग्रस्त दास,वे शयान शैल शृंग स्यात् , 
 भंग की उमंग में ममार्ति से अयान हैं।। 
यान आप शर्व के महान भक्त नन्दीगण,
 भ्रात ज्येष्ठ 'शुक्ल' के,सुमूर्तिमान ज्ञान हैं। 
नाथ से कहो कि तात आप तो कृपा समुद्र, 
 दीन पा रहे परेश क्यों कहो दया न हैं ?।32।।



गृह न कहीं है,अनिकेत आप मैने सुना, 
 प्रस्तुत परेश मेरा विमल हृदय है। 
पट न सुना है शम्भु!तन पर भवदीय, 
 अंतर के पट मम खोल लें,विनय है।।
प्रलय प्रभारी प्रिय विधि रचना का लय, 
 भेंट यह सविधि सृजन लय मय है। 
अस्त होवें अशुभ,पराजय विलुप्त सर्व, 
 दास की सदैव शिव विजय उदय है।।33।।


श्री भीमशंकर जी 

आज हैं उदास दास आपके भवेश क्योंकि, 
 न्याय,धर्म,सत्य के सु-साज अस्त व्यस्त हैं। 
पाप का उदोत है सवेग,पुण्य अस्त प्राय,
 प्रोत है अधर्म,धर्मदेव कष्ट ग्रस्त हैं।।
 ध्वस्त नीति है,अनीति के प्रशस्त पंथ,शूल- 
 हस्त!पस्त साधु संतहो रहे समस्त हैं। 
मस्त आप भंग की उमंग में हिमाद्रि श्रृंग, 
 और हे अनंग शत्रु!त्राहि!भक्त त्रस्त हैं।।34।।


प्रबल अराति वृन्द रचित कुचक्रव्यूह, 
 मध्य हूॅ फॅसा सा सद्य शत्रु शूल हूले हैं।
 सतत समस्यावृत मानस मदीय,हिये-
 उठते परेश नित्य सोच के बगूले हैं।। 
विगत गवाही है कि चाही जब भी सहाय,
 पा ही गया; 'शुक्ल'शम्भु बल पर फूले हैं।
 दास हैं उदास,आश एक जिस भव की है,
 भोले भूतनाथ क्यों न जाने आज भूले हैं।।35।।


प्रकट किया था शौर्य युद्ध में जलन्धर से, 
 भस्मकाम नाम लिये यम घबराते हैं। 
लाते ही पवित्र ध्यान पुण्यपुञ्ज विग्रह का, 
 पातक समूह भीत दूर भाग जाते हैं। 
देववृन्द आदि उच्चलोक के निवसी जीव,
 शंकर कृपा से नित्य आनन्द मनाते हैं। 
किन्तु भूमिलोक में तुम्हारे भक्त देखो नाथ!
 सत्यव्रती हो के दीन हीन दुख पाते हैं।।36।।


शिव!दुख तिमिर घिरा हूॅ जिससे मैं नित्य,
       छट जाय आशु,सुख ज्योति तीव्र मिल जाय।
कुग्रह,विकर्म,पाप पुञ्ज,शत्रुवृन्द द्वारा,
       सृजित समूल षडयंत्र दुर्ग हिल जाय।।
फिर तिल तिल जाय टूट आशु आशुतोष!
        उर में प्रबल चल भक्ति की अनिल जाय।
शम्भु,शम्भु,शम्भु रटता हूॅ बार बार शम्भु,
        शम्भु! अब हृदय कमल मम खिल जाय।।37।।


सो रहे समाधि में कि हो रहे नशे में मस्त-
    भंग के;अनंग के अराति क्यों न चेते हो?
सेते रहे सतत स्वभक्त वृन्द शिशु तुल्र्य,
     साक्ष्य हूॅ;स्वभाव से तुरन्त सुधि लेते हो।।
खेते सेवकों की नाव शैलजा चहेते तुम्ही,
      व्याज में सदैव भक्ति भाव मात्र लेते हो।
सचमुच इसबार लगते 'परेश' ही हो,
      लेश भी स्वदास का न ध्यान आज देते हो।।38।।


सतत प्रवाहमान पावन सुरस धार,
     मुखगत हरत सकल भव पीर है।
दूषण रहित अहितन जनप्रिय मन,
     हर हियताप जगरत न गम्भीर है।।
कालजयी,दण्डक,सु-मुक्तक ललित पद,
     शंकरीय भाव लय प्रिय मृदु तीर है।
उरग विभूषित,जटिल ,ओजवंत 'शुक्ल'-
      छंद है कि दिव्य चन्द्रचूड़ का शरीर है।39।।

देववृन्द आये हैं,लगाये भीड़ कैसी कहो,
      किन पर क्रम से स्वशीश रहे रख हैं।
ऋषिगण धाये चूमने को दर्श,पर्श हेतु,
      किनके सपदि छोड़ ध्यान,जप,मख हैं।।
कोटि सूर्य की सी ज्योति आ रही कहाॅ से यह,
      भक्त सेवकों के रहे खुल ज्ञान चख हैं।
हरष रहा है हिय लख लख क्या रे 'शुक्ल'!
       शुभ्र,शंकरीय,शुभ,शुचि पद नख हैं।।40।।

               

                        द्वितीय अध्याय पूर्ण हुवा।
                               -------------------- 

                                                     अध्याय--3---संदेश
                                                           ------------------

भूषण भवेश के भवान तुल्य कौन धन्य,
       जिनसे सुशोभित सदैव शम्भु तन है।
शीश पै गिरीश के तना है छत्र के समान,
        कैसा पुण्यवान भवदीय श्याम फन है।।
खेलता समोद आपसे है नित्य पूत कृत्य,
         शैलजा सपूत,बाल सिन्धुर वदन है।
नागराज!आप हैं महान्,क्षमादान मुझे,
          दीजिये कृपालु नाथ आपको नमन है।।1।।

हे असीम पुण्य युक्त,नित्यमुक्त नागदेव!
       शम्भु शीश छत्र!आप भक्त हितकारी हैं।
भूल हो गई करें क्षमा प्रसिद्ध दास नाथ-
        हैं परेश के;सदैव पूर्ण निर्विकारी हैं।।
शान्त कीजिये अमर्ष,हूॅ कनिष्ट भ्रात तात!
        ईश के सु-दर्श पर्श के प्रभो प्रभारी हैं।
हूॅ कृतज्ञ,आपने किया सचेत,जै महेश!
        सर्पराज!चित्त में मदीय मन्मथारी हैं।।2।।


दिव्य तेजवंत संत,शैलजेश के पुनीत -
        गेह में विराजमान कौन साधुवेष हैं?
मित्र ने लखा कि स्वप्न मध्य दे रहे भवान्,
        हैं मुझे महेश कीर्तिगान का निदेश हैं।।
भक्त हैं भवेश के कि दास हैं परेश के कि,
       अर्द्ध चन्द्रचूड़ के स्वदूत ही विशेष हैं।
धन्य!सप्रणाम दीजिये मदीय भी सॅदेश,
        'शुक्ल'चित्त देश में महेश हैं,महेश हैं।।3।।


नागदेव!नमन तुम्हें है नतमाथ नाथ!
        सतत लगाये आप शम्भु नाम रट हैं।
शर्व शीश शोभित सु-छत्र के समान,शान-
        आपकी महान् ,शक्तिमान श्रेष्ठ भट हैं।।
झट दिलवाते आप दर्श,पर्श शंकरीय,
        उचित न हो तो वीर रोकते झपट हैं।
विकट हुई है भूल तात कर देना क्षमा,
        नटराज के तो आप परम निकट हैं।।4।।


हे भुजंग!मित्र संग मैं गया भवेश भौन,
     चाव था अनंग के अराति से मिलाप का।
दर्श तो मिला परन्तु छू सका न श्री शरीर,
     क्योंकि ज्ञान हो गया त्वदीय रोष- ज्ञाप का।।
ज्ञात हो गया कि तात रुष्ट यों हुए कि बन्द,
     'शुक्ल'ने किया बखान शम्भु के प्रताप का।
कीजिये क्षमा अजान में हुई मदीय चूक,
      दन्दशूक!है प्रणाम! हूॅ कृतज्ञ आपका।।5।।

कौन संत वेष थे मिले परेश मन्दिरे सु-
       पुण्य पुञ्ज,स्वप्न मध्य मित्र श्री सुरेश के।
'शुक्ल'हेतु दे दिया सॅदेश गूढ़ धन्य नाथ!
       क्या विशेष दूत आप थे भवेश देश के।।
हैं बड़े समीप आप शम्भु के न शंक लेश,
       स्यात् आप हैं प्रगाढ़ मित्र श्री गणेश के।
या हिमाद्रि बालिका के दास हैं निजी भवान्,
       जो भी हों प्रणाम! गान गा रहा महेश के।।6।।

                                                                        तृतीय अध्याय पूर्ण हुवा।
                                                                                --------------------



                                                                अध्याय --4---संकीर्तन
                                                                        --------------------


व्याल फण पर,पड़ फिसल विखर कर,
         करती प्रकाशमान विश्व कण कण है।
ज्योति सम्भरण,हरण करती हिय तम,
         प्रखर कि कोटि सूर्य भास तुच्छ तृण है।।
करती पुनीत,शीत अंतःकरण 'शुक्ल',
         भासमान जीवन का हर पल क्षण है।
श्यामता क्षरण,शुचि,शोभनीय,शंकरीय,
          शैलजा-वरण-शीश-शशि की किरण है।।1।।


कैसी दिव्य,शीत,श्वेतता है शुभ्र फैली हुई,
       जिसके समक्ष कलि कल्मष विवश है।
गमक रही है सन्त सुखद सुगन्ध कैसी,
       व्यथित मनोज खाता बार बार गश है।।
सब उजला है,मात्र नीलिमा बची है कण्ठ,
       जिनके सुभाल मध्य बाल अंक-शश है।
ब्रह्म-अण्ड-कलश सु-शंकरीय तत्व युक्त,
        उफन गया है या कि शम्भु का सुयश है।।2।।


तन मन मेरा मोद मग्न है तरंगपूर्ण,
      किससे,न जिसकी कदापि कहीं थाह है।
धुल धुल जाता मन,और घुल घुल जाता,
       काम,क्रोध,लोभ,मोह,मद और डाह है।।
डूब डूब भगत,जगत सिंधु पार,धार-
        करती शमित,देह,दैव,भूत दाह है।
दीन मीन की पनाह,स्याह करे श्वेत वाह!
        शैल की सुता के नाह का दया प्रवाह है।।3।।


चाह है कि शिव परिवार का सदस्य बन,
     बैठ बीच आनन्द समुद्र मध्य पड़ लूॅ।
पावन परेश पूत विग्रह त्वदीय साम्ब,
     सद्य उर अमल कमल मध्य जड़ लूॅ।।
नाथ कहीं मिल जायॅ,तो विनम्र भक्ति युक्त,
     हाथ से सशक्ति,चन्द्रमाथ! मैं जकड़ लूॅ।
वरद!कृपालु हो,प्रणाम तात नत शीश,
     आज स्वप्न में महेश चरण पकड़ लूॅ।।4।।


करिवर वदन,सदन ज्ञान के हैं सुत,
    यान वर वृषभ,रुचिर मुख हरि है।
बाल चन्द्र भाल,व्याल कण्ठ में कराल,महा-
    काल,जटाजाल,चिर,शिर सुरसरि है।।
अथ न कहीं है इति,मंथन त्रिपुर उर-
     सरल,गरलधर,मनसिज अरि है।
देव, दैत्य,दनुज,मनुज,इन्द्नानुज,विधि,
     आदि से शिवानीपति शोभित उपरि है।।5।।


ॐ तत् सत् शिव सकल अमल देह,
    मलते विभूति 'शुक्ल'हिमवत् गौर हैं।
हरते त्रिताप,आप-शीश,विश्वभर, हर,
     विद्यमान दास मन,हर हर ठौर हैं।।
दान के विधान में समान है न कोऽपि,किन्तु,
     शैलबाल हिय हर,भक्त चित्त चोर हैं।
और कौन है त्रिलोक में महेश तुल्य दिव्य,
     सर्व देव वृन्द के भवेश शीशमौर हैं।।6।।


धार गंग की पुनीत शीश है,फणीश कण्ठ,
        ईश पुण्य नाम की महिम्न का न पार है।
अंधकारि ध्यान से विछिन्न जीव भव-बंध,
         चौदहों अनन्त का भवेश कंध भार है।।
पूर्ण निर्विकार,भर्ग वर्ग चार आशु  दे स्व-
         भक्त को ;महेश दार और भी उदार है।
शक्ति से सनी हुई 'श'कार औ 'व'कार श्रेष्ठ,
          सृष्टि में मनुष्य जन्म का पवित्र सार है।।7।।


आवो एच बार नाथ शैल की सुता के साथ,
        नन्दी पै सवार हो निहार बार बार लूॅ।
धार लूॅ हिये में वही छवि मनहर,हर!
         भक्त हूॅ कृपा हो जाय जीवन सॅवार लूॅ।।
पुण्य का प्रसार व्योम सा 'ह'कार से तथा 'र'-
          कार से  कु-संस्कार,पाप भार जार लूॅ।
वाह क्या मनोज्ञ रूप!रुक जाइये अनूप!
          आप के पुनीत साम्ब पद तो पखार लूॅ।।8।।

कर्म,भाग्य,भोग अति जटिल अनेक आह!
       आ गया कहाॅ हूॅ कौन से विचित्र गाॅव में।
है विरञ्चि लेख का अहो! बड़ा महत्व यहाॅ,
       क्लेश हैं अपार कष्ट त्रास ठाॅव ठाॅव में।।
नियति नटी है खेल रचती विभिन्न नित्य,
       नखत ग्रहादि भी लगे समस्त दाॅव में।
पाॅव में भवेश भामिनी के मैं पड़ा हूॅ 'शुक्ल',
        बैठ हूॅ गया परेश पद तल छाॅव में।।9।।


गल के गरल से समस्त खल भाव मृत,
       शमित त्रिताप शीश जह्नुजा के जल में।
कर लूॅगा अंतरदहर भासमान भाल-
       चन्द्र की किरण-माल धार एक पल में।।
वृत्तियाॅ बुरी कु-संस्कार औ विचार दुष्ट,
       जार दूॅगा मैं तृतीय नेत्र के अनल में।
अपवर्ग अचल सुता के पति का पवित्र-
        नाम;स्वर्ग है मदीय  शम्भु-पद-तल में।।10।।


देख मैं रहा हूॅ कल्पना में भली भाॅति देव-
        अंघ्रि कमलों में रहे माथ नाथ!टेक हैं।
यक्ष,नाग,किन्नर,तपस्वी,ऋषि,मुनि वृन्द,
         दर्शनार्थ द्वार पै लगाये हुए ठेक हैं।।
भेज रहे नन्दी उनको हैं भवदीय पास,
          बाॅध के कतार क्रमवार एक एक हैं।
व्यस्त वहाॅ आप, यहाॅ त्रस्त दास,स्वप्न में भी,
          आये नहीं नाथ,गये वासर अनेक हैं।।11।।


पारवती माॅ के प्रति प्रीति हो अगाध;बढ़े-
       दिन दिन दूनी,दूर काम,क्रोध,लोभ,मद।
मिट जाॅय सकल समूल गद मानस के,
       बुद्धि पै रहें विराजमान नित्य एकरद।।
रज,तम ह्रास,वृद्धि सत गुण की अपार,
      अंतर में हो प्रवाहमान शिवानन्द हृद।
वरद!मदीय कामना है सदा युक्त रहे,
      मेरा 'शुक्ल'शीश और पावन परेश पद।।12।।

शासक त्रिलोक का,विनाशक त्रिताप का है,
       त्रासक खलों का जो भलों को सानुकूल है।
मूल से मिटाता दुर्जनों को,सज्जनों के हेतु-
        फूल;उपजाता दम्भियों के हिये हूल है।।
भक्त वृन्द त्राता,पाता सुर वर्ग है पनाह,
        दुष्ट-पुञ्ज-कुञ्जर हेतु शारदूल है।
वामदेव वाम के सु-वाम हस्त में विराज-
        मान,शक्तिमान,शूलपाणि का त्रिशूल है।।13।।

विकट जटावों के कटाह मध्य भागीरथी,
       उलझ उलझ रह जाती फिर फिर है।
बाल इन्दु की है कैसी मनहर स्निग्ध ज्योति,
        जिसको नमन नित्य करता मिहिर है।।
भसम मले हैं रिपु असम-शिलीमुख के,
        व्याल हैं गले में रूप कितना रुचिर है।
प्रस्तुत निवास हेतु हृदय अजिर शम्भु!
         पद कमलों में नित्य नत 'शुक्ल'शिर है।।14।।


तेजवंत आप हे अनन्त!इस भाॅति हैं कि,
      कोटि सूर्य का प्रकाश लगता मलिन है।
गुणगण हैं अशेष,कह न सका है शेष,
       आदि से न काल कभी पाया जिन्हें गिन है।।
विदित त्रिलोक में कि विधि,विष्णु,देव काज,
        होता नहीं पूर्ण भवदीय कृपा बिन है।
भनक पड़ी है कान,जनक!दया का भाव,
         उर में त्वदीय रहा बढ़ दिन दिन है।।15।।


उलझ गई है जह्नु बालिका सदा के लिये,
       एक बार शम्भु जटा जाल मध्य फॅसकर।
उठ उठ धाती है मचाती जोर जोर शोर,
       किन्तु रह जाती हर बार धॅस धॅस कर।।
छटक छटक जाती,झटक झटक मस्त,
       'कल कल' स्वर करती है हॅस हॅस कर।
अटल अचल स्थाणु,मचल मचल मुग्ध,
        गंग, ज्यों जटाल-बाल-व्याल गया डॅसकर।।16।।


पद जिसके हैं स्वयमेव ही त्रिलोक पूज्य,
      पूजती इन्हें है प्रात वह मातु कलही।
भुवन सकल हीअधीन इनके है,फल,
       देते आशु चार,करें भक्त वृन्द भल ही।।
आनन्द अपार,सुख,शान्ति,लोक सिद्धि वृद्धि,
        पावे जो कि लावे इन्हें ध्यान एक पल ही।
इनकी झलक हेतु ललक रहे हैं देव,
         मेरी आश ऐसे शम्भु चरण युगल ही।।17।।

हरती हिये का तम,भरती प्रकाश,ज्ञान,
     करती प्रदान ज्यों मुनीश देवहूति को।
धन्य ईश मलते कपूर गौर देह,शिव,
     नमन मदीय शंकरानन्द प्रसूति को।।
शम्भु रमणी क्या भक्त हेतु है बताती धता,
      रवि के पुपूति को,विरञ्चि करतूति को।
मेरे लिये इसके समक्ष सर्व विश्व भूति,
      भूति तुल्य,नत इस भव तन भूति को।।18।।


नाम थे लिये असंख्य बार या गुणानुवाद ,
      गान कण्ठ ने किये सप्रेम कूज कूज के।
या अनेक जन्म हैं रहे महेश के गुलाम,
      पूत हो गये पदारविन्द पूज पूज के।।
शैल की सुता के आप दास थे बड़े सुधांशु!
       या अगाध भक्त थे भवेश के तनूज के।
शम्भु भाल पै विराजमान शान से सदैव,
        कौन पुण्य थे त्वदीय हे मयंक दूज के?।19।।


श्रीगणेश को है मिला ऋद्धि,सिद्धियों का स्वत्व,
      मुदित सुरों ने अमरत्व लाभ पाया है।।
ऋषि,मुनियों को है अभीष्ट मुक्ति दान मिला,
      याचक समूह को समस्त मन भाया है।।
आनन से वर हर कर से हरेक वस्तु,
      देने में लगे हैं शम्भु,'शुक्ल'यश छाया है।
बार बार अम्बा है दिलाती याद मेरी उन्हें,
      किन्तु स्यात् मेरा अभी नम्बर न आया है।।20।।


ऐ हो नटराज!कला बहुत चली है किन्तु,
       अब न चलेगी प्रिय पाहन कली का हूॅ।
करती रली जो आप ही से रही नित्य,कीर्ति-
        गायक उसी मैं दक्ष यज्ञ में जली का हूॅ।।
कार्तिकेय जैसे बली का हूॅ मैं कृपा का पात्र,
         याचक पुराना नाथ!आपकी गली का हूॅ।
हिमगिरिजाया के सु-अंक  में पली का भक्त,
         सेवक निजी मैं शम्भु!शैल की लली का हूॅ।।21।।


करते सदैव दास आश आशु पूर्ण आप,
       क्यों न हो प्रसिद्ध अम्ब पूर्णा वरण हो।
दरते दयालु दीन दास के दुरित सब,
       कष्ट के हरण किये पुनीत प्रण हो।।
क्षरते कुयोग ईश नाम ही लिये पवित्र,
       सुनते स्वभाव से पुकार तत् क्षण हो।
हरते तुरन्त रहे हर 'शुक्ल'आर्ति किन्तु,
       अब हे कृपालु स्यात् हो गये कृपण हो।।22।


शैलजा विभाति वाम,नाम आपका 'शिवेति',
      दास चातकाय व्यालहार!धार स्वाति है।
कीर्तिगान है समस्त क्लेश का निदान,ध्यान,
      नाथ का सभी विकार का सदा अराति है।।
आपकी उदारता के भार से दबे हैं देव,
      शाम्भवी दया से आर्द्र मानवीय जाति है।
आन है भवान् की बढ़े सदैव भक्त शान,
      वाह!क्या प्रभो की दानशीलता की ख्याति है।।23।।


मंगल सदन,मदन के रिपु आप को तो,
      करती द्रवित,मात्र भक्त एक टेर है।
भाग्यहीन जन को दिया है भूत में जो,भूत-
      नाथ! उसे देख हुवा लज्जित कुबेर है।।
हेर रहा कातर तुम्हें हूॅ,हैं तटस्थ आप,
      शीश भार ढेर,या मदीय काल फेर है?
शेर यान वाली मान जायगी बुरा हे दान-
      वीर!क्यों लगा दी इस बेर बड़ी देर है।।24।।


दास हूॅ पुराना उस शैल की सुता का,हाथ,
      सर्वदा उठाये भक्त हेतु है अभय का।
उभय मदीय इष्ट,आया जब जब क्लिष्ट-
      काल;पंथ मैने चुना ईश की विनय का।।
छलका के करुणा, हे करुणाकर करते,
       हलका कुभार 'शुक्ल'बोझिल हृदय का।
कबसे पुकार रहा देते नहीं ध्यान नाथ!
       फेरे हो निगाह कुछ फेर है समय का।।25।।


विगत विपत्तियों में सतत रहे हो साथ,
      शीश पै मदीय धरे हाथ नाथ!याद है।
गरिमा गिरी थी इस बार मार के अराति!
       महिमा दिला दी वही अब न विषाद है।।
क्या सुकर्म थे भला कि भाग्य ही कहीं था श्रेष्ठ,
       सकल महेश आपका कृपाप्रसाद है।
जनक हमारे,भक्त त्राण व्रत धारे,;काज,
        सर्वदा सॅवारे क्या कहूॅ मैं 'धन्यवाद' है।।26।।



कुछ न यहाॅ है कर्म का विधान,ज्ञान,यम,
       नियम;विधाता व्यर्थ लिखते ललाट हैं।
सब कुछ शम्भु,शैलजा की भक्ति सेवा जप,
        ध्यान ही यहाॅ है,'शुक्ल'कहते सपाट हैं।।
मुझसे विकर्मलीन,भाग्यहीन को ही लखो,
        दास था,दिला दी शान बान हुए ठाट हैं।।
धन्य हे अनन्य!सिन्धुजन्यमाथ! आप हेतु,
        लघु काज क्या  था भला नाथ तो विराट हैं।।27।।



प्रात के समय,साॅध्यकाल में दिवस, निशि,
       परम पुनीत शम्भु नाम मैं पुकारे हूॅ।
शैलजा समेत शिशु शशि शीश का पवित्र,
        विग्रह सदैव 'शुक्ल'हिय मध्य धारे हूॅ।।
वारे हूॅ निजत्व उन पर ही,परेश शक्ति,
        ध्यान,जप, कर कर जीवन सॅवारे हूॅ।
हारे हूॅ स्व-तन,मन,धन शिव के निमित्त,
        हर क्षण हर हर-वाम के सहारे हूॅ।।28।।



कुछ भी रहे हों उस व्यक्ति के विकर्म या कि,
       विधि का विधान,आते निकट न दुख हैं।
क्लेश,लेश भी न,ताप,पाप आप ही सुदूर,
       क्रूर ग्रह करते न उस ओर रुख हैं।।
ककुभ समस्त उस भक्त हेतु शंकरीय,
       सतत समस्त सुखसागर  क कु ख हैं।
जिससे प्रसन्न पर्वतेश पुत्रिका के पति,
        वामदेव दाहिने,दयालु पञ्चमुख हैं।।29।।



शम्भु,शम्भु,शंकर,शशीश,शर्वरीश शीश,
       नाम नित्य ले रहा पवित्र हूॅ शिव जी का।
फीका सब और नीका साम्ब शम्भु श्रीविग्रह,
        जप ध्यान द्वारा हूॅ जुड़ाता ताप मैं ही का।।
मार तुल्य मानी का गुमान किया भंग,कौन,
         दानी तीन लोक मध्य शशि-शिर सानी का।
गायक गुणों का 'शुक्ल'पायक पदों का पूत,
         शैलजानुरक्त भव्य भक्त हूॅ पिनाकी का।।30।।



सानुकूल सत्य,धर्मशील सेवकों के लिये,
      खलदल के निमित्त नित्य प्रतिकूल है।
हरता हिये की शूल,हर पद पायकों की,
      भरता भलों के त्रासकों के चित्त हूल है।।
वहन सु-योग क्षेम जन का करे;कु-योग-
      गहन विनष्ट आशु करता समूल है।
फूल तुल्य पंथ सन्त वृन्द का करे;परेश-
      भक्त हेतु शंकरीय शम्भु का त्रिशूल है।।31।।



हर स्वर विश्व का रहा हो कर्णगोचर जो,
      मेरे लिये श्रुतिप्रिय 'हर हर' नाद है।
वाणी का प्रयोग मेरा सकल मधुर कटु,
      देता मुझे दिव्य 'शिव शिव'नाम स्वाद है।।
सर्व शम्भु अम्ब रूप,क्वचित् न अपवाद,
      भजन उन्ही का मम वाद है विवाद है।
हर्ष या विषाद जो भी नाथ करते प्रदान,
      सब कुछ मेरे लिये शंकर- प्रसाद है।।32।।


हे हे शिव शम्भु! आये संकट अनेकानेक,
      काट दिये पल में गवाह चश्मदीद हूॅ।
आपकी कृपा से मेरे खल शत्रुवों के लिये,
      रहता मुहर्रम मनाता 'शुक्ल'ईद हूॅ।।
अधम, अनैतिक जनों की भ्रष्ट नीतियों की,
        करता तुम्हारा बल पा के तरदीद हूॅ।
शिखर चढ़ावें या कि कर दें मिट्टी पलीद,
        अर्पित तुम्हें हूॅ नाथ! दे चुका रसीद हूॅ।।33।।


ऋद्धि,सिद्ध सकल समृद्धि तोष वृद्धि मूल,
        सानूकूल सेवक जनों को शान्ति धाम है।
अष्टयाम वाहक सुखों का,दुख दाह करे,
         हरे हरे त्रास तम हेतु घोर घाम है।।
मनहर,महिम,मनोज्ञ,मधुमय,मञ्जु,
         मंगल निलय मृदु ललित ललाम है।
शंकर- शरण'शुक्ल'हेतु शुभकर,शोक,
          अशिव शमन शुचि 'शिव शिव'नाम है।।34।।

सेवक पुराना पुर मथन परेश का हूॅ,
    चाकर चराचर के नाथ उमावर का।
शम्भुदास,भृत्य हूॅ प्रसिद्ध शाम्भवी पति का,
     अनुचर नित्य शीश शिशु शशिधर का।।
अष्टयाम हूॅ गुलाम मार रिपु का ही 'शुक्ल',
      शंकर कमेरा,चिर चेरा शूलकर का।
सागर दया के हैं,कृपाकर स्वामी मदीय,
       प्रिय परिचारक हरेक पल हर का।।35।।

पाटते दयालु आशु ही कुयोग गर्त और,
      कुटिल ललाट लेख की प्रचण्ड काट हैं।
भक्तिमान ही सदा भवान हेतु हैं महान्,
       अन्यथा समस्त ऊॅच,नीच एक घाट हैं।।
दीन दास के लिये खुले कपाट सर्वकाल,
       देव वृन्द जोहते सदा त्वदीय बाट हैं।
लाट हैं हुजूर!आप तीन लोक विराट,
       धन्य 'शुक्ल'शम्भुराज के प्रसिद्ध भाट हैं।।36।।


इनके प्रखर तेज से प्रकाशमान सूर्य,
      चन्द्र,भूमि,नखत,सतत रहे डोल हैं।
घोल रहे अमृत भवेश-भक्त चित्त मध्य,
       दास के विकास द्वार सद्य रहे खोल हैं।।
अतुल प्रताप है,असीम महिमा अपार,
       इनका प्रभाव,भाव भव्य अनमोल है।
लोल मन करते अलोल आशु निग्रहीत,
       कवि के सुगीत मीत हर हर बोल हैं।।37।।

भर जो रहा समस्त लोक,चौदहों अनन्त,
      भूमि,व्योम,अंतरिक्ष कौन ये प्रखर है?
प्रियतर साधु संत जन को अहर्निशि,
      खलदल के निमित्त नित्य भयकर है।।
कल्प अंत समय प्रलयकर;शंकरीय,
      अनहद नाद से सुखद बहुतर है।
मनहर भक्त वृन्द हेतु आठहो प्रहर,
       हर के डमरु का डमर डम स्वर है।।38।।


ले रहे सभक्ति कामशत्रु नाम भोर शाम,
      वे समस्त धन्य शम्भु अंतरंग हो लिये।
धो लिये असंख्य जन्म के अनन्त पाप ध्यान-
      मग्न हो;न तो कुबुद्ध जन्म जन्म रो लिये।।
खोलिये सुनैन बन्द,मन्द प्रज्ञ लोक वृन्द!
       शंकरीय भाव की सुधा स्वचित घोलिये।
बार बार अम्ब अम्ब की उठे पुकार कण्ठ,
        हे हरे!हरे!परेश शम्भु शम्भु बोलिये।।39।।

निज निज पंथ पर सकल नखत,ग्रह,
     गतिमान विश्वचक्र जिनके बलात् है।
जानते न मर्म शेष,व्यास,नारदादि कोऽपि,
       विष्णु हैं विनीत,नम्रशीश देवव्रात है।।
स्नात जो भवेश भक्ति भाव में समक्ष तस्य,
       विधि के विलोम लेख की सदैव मात है।
सात द्वीप,चौदहों अनन्त, तीन लोक मध्य,
       शम्भु के समान कौन किसकी बिसात है?।40।।


ज्ञान भर देता,हर लेता मन के विकार,
      कर देता प्रबल अवद्या तम नाश है।
हारे थके और बुझे कितने उरों में नित्य,  
      देता है सचार शुचि नव नव आश है।।
सुर मुनि साधक उसी की खोज में हैं लीन,
      दीन 'शुक्ल'को भी सदा उसकी तलाश है।
श्रेय संत वृन्द हेतु,शंकरीय शिव पद-
       नख- मणियों का मञ्जु विमल प्रकाश है।।41।।

याचक दुखी था अति दीन कल तक यह,
        क्षुधित अपार आज गेह भरा अन्न है।
परम समृद्ध अहो सद्य यह कैसे हुवा?
        धनद समान, किसी भाॅति न विपन्न है।।
कहाॅ सन्न सन्न सूना घर कल,खन्न खन्न,
        आज हेम,हीरक रमा की छन्न छन्न है।
कैसे यह?पन्नग गले में फन्न फन्न होते,
         जिसके, परेश वही इससे प्रसन्न है।।42।।


धुल जाते कलुष समस्त जन्म के समूल,
       खुल जाते आशु उर अंतर के चख हैं।
झष मारता है लिखा विधि का ललाट लेख,
        मीन,मेष मौन,ग्रह पाते नहीं लख हैं।।
उसको न लेना कुछ कर्म के विधान से है,
        दे ही क्या सकते उसे दान, ज्ञान,मख हैं?
जिसके हिये में भासमान सदा शंकरीय ,
       'शुक्ल'शुचि,शिशु-शशि-शिर पद नख हैं।।43।।


चलती नहीं है एक चाल काल की कदापि,
      भक्त से तुम्हारे, जय हे महेश महाकाल।
ताल ठोंकते दास आपके ग्रहों से क्रूर,
       दूर ही रहे कुभाग्य,गलती कभी न दाल।।
देह भूति देती षट भाॅति भूति सेवक को,
       मालामाल आशु है,कपाल माल का कमाल।
टाल सकता है नहीं जिनका निदेश कोऽपि,
        जयति जया के पति,जय जय हे जटाल।।44।।


स्थाणु हैं परन्तु वे घुमा रहे समस्त लोक,
     भ्रमित निदेश से सदैव काल चक्र है।
वाम शैलबाल,धाम शैल श्रृंग,किन्त शम्भु-
      दास वर्ग में सुरेश शैल शत्रु शक्र है।।
शीश गंगधार में असंख्य मीन नक्र; भस्म,
      है किया अनंग यस्य केतु एक नक्र है।
क्या विचित्र हैं मदीय देव देह'शुक्ल',कण्ठ-
       नील;है स्वभाव साधु भाल चन्द्र बक्र है।।45।।


जल शीश,जलती ललाट अग्नि,विश्वताप-
       त्राण हेतु जन को दया का जल देते हैं।
बल निबलों के कल,अकल,सकल शिव,
        कल न समस्या का तुरन्त हल देते हैं।।
छलहीन दीन की पुकार सुन व्यालहार,
         अविलम्ब अम्ब के समेत चल देते हैं।
खल दल देते,साधुवों को सेते हर पल,
          संत को स्वभक्ति का अनन्त फल देते हैं।।46।।


भय न कहीं है क्योंकि भीम,भव,भूतनाथ,
      साथ ही सदैव मम शक्ति के अयन हैं।
मयन अराति नित्य रक्षक हमारे तभी,
      शत्रु वृन्द मेरे कभी पाते विजय न हैं।।
जागते सचिन्त रिपु त्रस्त,अस्त-भाग्य;व्यस्त-
       धर्म कर्म 'शुक्ल'मस्त करते शयन हैं।
शोच है न किञ्चित करेंगे पोच क्या मदीय,
       मोचक दुखों के दयासिंधु त्रिनयन हैं।।47।।

स्वप्न मध्य आकर छपाकर लसित भाल,
        चाकर को अपनी उपस्थिति जता जायॅ।
छा कर मदीय मनोलोक में,कहाॅ है ओक,
         नगर त्वदीय? इस दास को बता जायॅ।।
पता नहीं आपको सताते मुझे ग्रह क्रूर,
         मन्द भाग्य,पाहि प्रभो!अब न सता जायॅ।
सकल कुयोग,कुविचारों को बता के धता,
         बुद्ध कर मेरी भक्ति भाव में रता जायॅ।।48।।

केशजाल मध्य मञ्जु छहर छहर स्वर,
       हर हर शब्द शुचि कल कल नाद है।
मनहर गंग का;अधर यदि जलपान,
        लें कर तो विगत सकल अवसाद है।।
रुचिर कपूर तुल्य देह में रमी विभूति,
         हृदय तरंगीभूत कर कर याद है।
देती फल चार है भवेश भक्ति निर्विवाद,
         अद्भुत 'शिव शिव' 'शम्भु' नाम स्वाद है।।49।।

लोभ,मोह,क्रोध,मद,द्वेष,कुछ कुछ शान्त,
       उतना सताता अब रति का धव न है।
भव की कृपा से कम भव प्रेम,भव प्रेम-
        वृद्ध;ध्यान,जप हीन बीतता लव न है।।
अंतर सुधा की धार झर झर हर हर,
        बोलता 'शिवेति'सदा श्वास का पवन है।
मन है मनोज रिपु शम्भु का सदन शुभ,
        हृदय सदय साम्ब शंकर भवन है।।50।।

तम कर नाश भर चित्त में प्रकाश देता,
      दिव्य शम्भु नाम,बिना शम,दम,यम है।
यम है अधीन मीनकेतु गर्वहारी शर्व,
      इति नामधारी त्रिपुरारी इष्ट मम है।।
रम रम जाता मन,थम थम चरणों में,
      नयन भरे हैं,प्रेम वारि शीश नम है।
परम पुरुष प्रिय डम डम नाद मुग्ध,
      बम बम स्वर से शिवा का प्रियतम है।।51।।

शीशोपरि ईश की कृपा का कर है सदैव,
         दैव क्या करेगा रहे चाहे खड़ा दाॅव में।
पग पग पर भी यदि होंगे अनिष्ट योग,
         तो क्या हुवा?इष्टदेव मेरे हर ठाॅव में।।
नगर निवास का मदीय शम्भु अंतःपुर,
         और शंकरीय वास मम उर गाॅव में।
लेश है न क्लेश,शेष है अशेष सौख्य,शान्ति,
         शीतल,सुरम्य शर्व पद तल छाॅव में।।52।।

बीत है रहा सुकाल अम्ब ध्यान,अर्चना में,
       हो रहा परेश कीर्तिगान में व्यतीत है।
मीत है मदीय चित्त देश का महेश वेष,
       दिव्य श्री शिवेति शब्द 'शुक्ल'कण्ठ गीत है।।
जीत-हार पा गुहार बार बार नागहार,
       हार तू न मान री गिरा सॅवार जीत है।
हो रहा प्रतीत क्या पवित्र स्वादपूर्ण शम्भु,
       नाम कामशत्रु का अह!महा पुनीत है।।53।।

भूमि,व्योम,अंतरिक्ष में है कहो कौन स्थान,
       विद्यमान अर्द्ध चन्द्रशेखर जहाॅ न हैं?
परहितकारी,स्वार्थ रहित पुरारी,ऐसे,
       करते भवेश भव हित विषपान हैं।।
भाग्य लेख देख 'हाॅ हाॅ' टोंकते हैं मुख चार,
        पाॅच मुख'हाॅ' ही कहते हैं,तो भी 'ना' न हैं।
म्लान चित्त कर देते आनन्द विभोर आशु,
         क्या न हाॅथ में है शर्व सर्व शक्तिमान हैं।।54।।


रे रे मन मनज अराति भक्ति धारा मध्य,
      डूब डूब अंतर का सारा तू तम धो ले।
बोल बोल कण्ठ मनहर हर हर मंत्र,
      हर पल रसना री! 'शिव शिव'ही बोले।।
खोले हिय नैन कीर्तिगान से उमा-धव के,
      अम्बा-भव ध्यान से स्व-चित्त में सुधा घोले।
हो ले उनका ही डोले शम्भु भाव लोक बीच,

      गंगाधर जय हो,हर हे शंकर भोले।।55।।

शिव सम है न तीन लोक मध्य शक्तिमान,
       दानशील कोऽपि 'शुक्ल'इस दृढ़ मत के।
हैं अनूप कृत्य रूप नाम विरूपाक्ष नित्य,
       मूर्तिमान आनॅद स्वरूप चित सत के।।
सदय हृदय,भय ध्यान मात्र से सुदूर,
       रक्षक सदैव भक्त विनयावनत के।
पाहि प्रभो!सुत मैं त्वदीय ही समस्त काल,
        नाथ!आप हैं प्रसिद्ध जनक जगत के।।56।।

सतत समाधि लीन मीनकेतु रिपु आप,
      योग नींद मग्न,दीन हित को सचेत हैं।
मृत्युजीत,अजर,अमर,अविनाशी नित्य,
      किन्तु हर!भवदीय सहचर प्रेत हैं।।
निलय मसान घाट,दुखमय,लय धर्म,
      मुदित सदैव प्रभु आनन्द निकेत हैं।
लघुतम मैं,विराट आप में त्रिलोक सर्व,
      उर में मदीय नाथ शैलजा समेत हैं।।57।।

हर हर भक्त की विपत्ति आशु हर!हर-
      दास चित्त भव्य भव भाव युक्त कर कर।
भर भर भवन भवेश!सेवकों का शीघ्र,
      भूति से अभूत हो अकूत रमा घर घर।।
क्षर क्षर कलुष महेश कीर्ति गायकों के,
       पायकों से दूर भगें कालदूत डर डर।
थर थर कम्पमान हों अनिष्ट,बोल रहा,
       शम्भुशीश,गंग का पुनीत स्वर झर झर।।58।।

रग रग रोम रोम में मदीय हैं महेश,
      रहित शिवापति से बीतता लव न है।
सतत उमा के धव,मनभव रिपु नाम-
       जिह्वापर रुचिर शिवेतर रव न है।।
हर हर मंत्र मञ्जु अंतरंग नाड़ी तंत्र,
       करता पुकार  'शिव'श्वास का पवन है।
स्वर,लय,ताल मेरे अर्पित उन्ही के हेतु,
       हृदय हमारा 'शुक्ल'शंकर भवन है।।59।।

नमन करें न क्यों सुरेश,शेष,यम,वायु,
      सुत ही त्वदीय जब देव हैं प्रथम नाथ।
शम,दम,नियम न ज्ञात हों तथापि,उर-
      तम नाश कर स्वर 'हर हर बम' नाथ।।
अधम परम यदि 'शिवशिव'नाम कहे,
      तो मिले न क्या कहो? त्रिलोक धन कम नाथ।
रम है रही उमा सु-बाम अर्द्ध अंग शुभ,
      स्वप्न में दिखावो यह छवि अनुपम नाथ।।60।।


शीश गंग,शत्रु हैं अनंग के असंग,संग-
      वाम,वामदेव,अंग नित्य शैलजा विभाति।
भूख मात्र भाव की,स्वभक्त चित्त में निवास,
      मानते न भेद कौन वंश,सम्प्रदाय,जाति।।
कण्ठ में पड़ी कपाल दाम, है जटाल नाम,
       दास चातकों के हेतु तृप्ति मूल बिन्दु स्वाति।
ख्याति है कि हो छदाम योग्य जो न मंद भाग्य,
        दें उसे तमाम,हो प्रसन्न काम के अराति।।61।


नत शिर नित्य हूॅ नगेश तनया धव को,
     भव पद रज भाल शोभित ललाम है।
काम शत्रु के ही शुभ चरण गहूॅ सदैव,
     ध्याऊॅ उन्हें,जिनका 'शिवेति''शुक्ल'नाम है।।
वाम अंग जिनके गिरीश सुता अष्टयाम,
     मस्तक झुकाना उन्हें अति प्रिय माम है।
आम है कि खास,दास हूॅ महेश का,करोमि,
     नमन महेश को,परेश को प्रणाम है।।62।।

                                                                    श्री दुर्गार्पणमस्तु
                                                                         --------------

  माध्यम से प्राप्त भगवान भूतभावन शिव जी के संदेश किंवा आदेश के परिपालन में 'शिव संदेश' शीर्षक 147  छन्दों की यह सुमनावली पूर्ण हुई।



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