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Tuesday, 8 April 2014

गीता दोहन *

               
                                   पहला अध्याय

धृतराष्ट्र ने कहा-
                                                            1.

कुरुक्षेत्र के धर्म क्षेत्र में एकत्रित रण हित जो आज । 

मेरे तथा पाण्डु पुत्रों ने संजय ! कहो किया क्या काज ।।                                                              

                                                          2.


संजय ने कहा-

दुर्योधन नृप ने अवलोकित की है व्यूहबद्ध रिपु सैन ।

जाकर पास द्रोण गुरु के अब कहे नृपति ने हैं ये बैन ।।
                                                        3.
 
देखो तात पाण्डवों की यह सेना कैसी खड़ी महान् ।

व्यूहित हुई द्रुपद सुत से जो है तव शिष्य परम धीमान् ।।
     
                                                       4.

भीमार्जुन सम महा धनुर्धर उधर विपुल समरांग्ण में ।

महारथी नृप द्रुपद तथा सात्यकी ,विराट खड़े रण में ।।
                                          
                                                  5.

धृष्टकेतु हैं चेकितान भी तथा वीर काशी अवनीप ।

कुन्तिभोज पुरुजित एवं नर श्रेष्ठ शैव्य भी खड़े समीप ।।


                                        6.

युधामन्यु , अभिमन्यु , तथा रण शूर उत्तमौजा विक्रान्त ।

तथा उपस्थित द्रुपद सुता के पांच बलशाली कांत ।।

                                        7.
                                                                                                         


हे ब्राह्मण कुल श्रेष्ठ ! करो अब मेरी सैन्य शक्ति का ज्ञान ।
जो रणशूर विशिष्ट हमारे उन्हें गिनाता मैं श्रीमान् ।।

                                  8.

आप स्वंय हैं यहां उपस्थित ,कृपाचार्य बलशाली कर्ण ।

अश्वत्थामा,भीष्म पितामह एवं भूरिश्रवा विकर्ण ।।

                                   9.
अगणित शूर अन्य भी आये युद्ध विशारद अति बलवान ।

मेरे हित में जो पल भर में कर सकते जीवन बलिदान ।।

                                10.

भीष्म पितामह से रक्षित है चिर अजेय मम सैन्य प्रवीण ।

किन्तु भीम से आरक्षित है शत्रु अनी अति निर्बल क्षीण ।।

                                         
                                    11.
पूर्व सुनिश्चित स्थानों पर अब सब शूर रहो तैयार ।

रक्षा करो भीष्म की सब मिल कहा नृपति ने है ललकार ।। 
                                  12.
 
शंखनाद कर शान्तनु सुत तब करने लगे गर्जना घोर ।

सुनकर नाद भूप दुर्योधन हुए हृदय में हर्ष विभोर ।।
                             13.
ढोल,मृदंग,शंख,रणभेरी की ध्वनि सहसा हुई अपार ।

तुमुल शब्द से जिसके तत्क्षण गूंज उठा सारा संसार ।।
                              14.
हुए शंख ध्वनि करने में तब अर्जुन और कृष्ण तल्लीन ।

युगल पुरुष जो श्वेत बाजियुत सुन्दर रथ में थे आसीन ।।
                                    15.
 
' देवदत्त ' था शंख पार्थ का ' पाञ्चजन्य ' धारी गोपाल ।
' पौण्ड्र ' बजाया भीमसेन ने जिनके कृत्य परम विकराल ।।

                                  16.

                                                                                                                                                                                 
                                                                               (.....जारी है....) 
*साल 1982 मे प्रकाशित मेरी पुस्तक ' गीता दोहन ' (श्रीमद्भगवद्गीता का हिंदी पद्यानुवाद ,यथारूप) का ऑनलाइन संस्करण ।


Tuesday, 23 April 2013

जपयोग

आत्मा के परमात्मा से योग की विधियों में जपयोग का बड़ा महत्व है जिसमें मंत्र-जप सहित ध्यान माध्यम बनता है। ध्यान अपने आराध्य के पूर्ण चित्र या शरीर के किसी विशेष भाग पर अथवा मंत्र के अर्थ या शब्दों पर किया जाता है। मंत्र गुरु प्रदत्त होना चाहिए। गुरु मंत्र न होने पर आकार में छोटा मंत्र चुने, जैसे राम या ओम आदि। मंत्र का उद्देश्य ही है कि मनन से त्रण दिलाने वाला। कहा गया है कि शब्द में महान शक्ति होती है और मंत्र-स्वर की लहरियां संपूर्ण आकाश मंडल में प्रवाहित होकर प्रभाव डालती हैं। मंत्र के चित्र या श्री विग्रह भी होते हैं। मंत्रर्थ न जानते हुए या अज्ञानी होते हुए भी यांत्रिक ढंग से जप करने पर भी वैज्ञानिक आधारों पर मंत्र से संबंधित स्वरूप साधक के अंत:करण में प्रविष्ट होकर आत्म प्रकाश फैलाएगा। मंत्र जप तीन प्रकार का होता है। वैखरी अर्थात् स्फुट उच्चारण करके, उपांशु अर्थात बहुत हल्केस्वर से अर्थात जिसे दूसरा न सुन-समझ सके और मानसिक, जो अंदर ही अंदर चले। जप में ज्यो-ज्यों आगे बढ़ते जाएंगे, ध्यान की सघनता और आराध्य में संलग्नता बढ़ती जाएगी और कालांतर में अविरल ध्यान ही चलेगा, जो समाधि या ब्राह्मी स्थिति में परिवर्तित हो जाएगा। साध्य प्राप्त हो जाने पर साधन के उपयोग की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी। दूसरे शब्दों में कहें तो ऐसी स्थिति में मंत्र की विशेष उपयोगिता नहीं रह जाती है। गीता के दशम अध्याय में अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि यज्ञों में मैं जपयज्ञ हूं। वीर शिवाजी के गुरु रामदास को आध्यात्मिक ऊंचाइयां श्रीराम जयराम जय जय राम के जप से मिलीं, जिसे उन्होंने गोदावरी के जल में खड़े होकर तेरह करोड़ बार जपा। स्पष्ट है कि जप की महत्ता अनिर्वचनीय और लोक हितकारी है। जिसने भी जप का महत्व समझ लिया और अपने तथा लोक के कल्याण के लिए इसका सहारा लिया उसे इसका लाभ मिलना तय है। रघोत्तम शुक्ल http://epaper.jagran.com/ePaperArticle/23-apr-2013-edition-Delhi-City-page_8-16555-104940208-4.html(यह आलेख दैनिक जागरण में दिनांक 23 अप्रैल 2013 को प्रकाशित हुआ । )

Sunday, 14 October 2012

कर्म और भाग्य

सृष्टि में कर्म प्रधान है या भाग्य, यह जिज्ञासा प्राय: मानव में बनी रहती है, क्योंकि बहुधा शुभ कर्मकर्ता कष्ट सहते, दुखी और पाप कर्मरत जीव सुखी दिखाई पड़ते हैं। मनीषियों ने कर्म प्रधान विस्व रचि राखा और करम गति टारे नाहिं टरी भी लिखा तथा होइहइ सोइ जो रामरचि राखा तथा विधाता के भाग्य लेख की भी बात लिखी है। सच क्या है? वास्तव में यह विरोधाभास दृश्यमान मात्र है और भ्रम भी है। जगत कर्म प्रधान ही है और मानव तन कर्म से ही निर्मित है। कर्म के तीन स्तर है 1. संचित, 2. प्रारब्ध और 3. क्रियमाण। असंख्य जन्मों में किए कर्म संचित के रूप में सदा जीव के साथ संलग्न रहते हैं और देहांतर पर सूक्ष्म शरीर के साथ संस्कार रूप में विराजमान रहते हैं। कर्म सामान्यत: भोगने से ही कटते या क्षय होते हैं। किसी जन्म विशेष में संचित का जो अंश प्राणी भोगता है उसे प्रारब्ध या भाग्य कहते हैं तथा वर्तमान में किया जाने वाले कर्म क्रियमाण कहलाता है जो सामान्यतया संचित में जुड़ता है और उत्कट क्रियमाण तात्कालिक फलदायी भी होता है। जब अच्छे कर्म करते बुरे भोग मिलें तो समझिए कि प्रारब्ध वश कोई जन्मांतर का पाप कर्म हम भोग रहे हैं और पाप कर्मरत सुखी दिखाई पड़े तो समझिये कि वह पूर्व जन्मों के पुण्य भोग रहा है। कर्मो का क्षय या तो भोग से होगा या ज्ञानाग्नि से उन्हें दग्ध किया जा सकता है। कर्म शुभ, अशुभ और मिश्रित होते हैं। आद्य शंकराचार्य के अनुसार मैं ब्रम्ह हूं ऐसा ज्ञान होते की करोड़ों कल्पों के संचित कर्म नष्ट हो जाते हैं। ब्रम्ह और आत्मा की एकता जानने वाले तत्व ज्ञानी के पूर्व कर्म तो दग्ध हो ही जाते हैं, वह आगामी कर्मो अर्थात क्रियमाण से भी नहीं बंधता, क्योंकि वह निर्लिप्त भाव से उदासीनवत् कर्म कर रहा होता है और चलता फिरता साक्षात निर्गुण ब्रम्ह है। राज्य करते हुए भी राजा जनक का विदेह होना इसी स्थिति का द्योतक है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि हे अर्जुन! योग में स्थित रहकर, संग त्यागकर कर्म करते रहो। - रघोत्तम शुक्ल http://epaper.jagran.com/story1.aspx?id=17990&boxid=108144920&ed_date=12-oct-2012&ed_code=4&ed_page=10