Monday, 7 October 2013

नदियों में मूर्ति विसर्जन पर रोक,एक सही फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संगम नगरी की गंगा-यमुना नदियों में देवी-देवताओं की मूर्तियों के विसर्जन पर रोक लगा दी है । कोर्ट का ये आदेश अगले साल से उत्तर प्रदेश की सभी नदियों में मूर्ति विसर्जन पर रोक लगा देगा ।  ये एक स्वागत योग्य फैसला है । धार्मिक मामलों में अभी और सुधार की जरूरत है । ऐसे और सख्त फैसले आने चाहिए ।   

Monday, 2 September 2013

आसाराम को जेल भेजना, देर से उठाया गया छोटा कदम

आसाराम को जेल भेजा जाना, देर से उठाया गया एक छोटा कदम है । आसाराम की सारी संपत्ति का राष्ट्रीयकरण किया जाना चाहिए ।

Tuesday, 23 April 2013

जपयोग

आत्मा के परमात्मा से योग की विधियों में जपयोग का बड़ा महत्व है जिसमें मंत्र-जप सहित ध्यान माध्यम बनता है। ध्यान अपने आराध्य के पूर्ण चित्र या शरीर के किसी विशेष भाग पर अथवा मंत्र के अर्थ या शब्दों पर किया जाता है। मंत्र गुरु प्रदत्त होना चाहिए। गुरु मंत्र न होने पर आकार में छोटा मंत्र चुने, जैसे राम या ओम आदि। मंत्र का उद्देश्य ही है कि मनन से त्रण दिलाने वाला। कहा गया है कि शब्द में महान शक्ति होती है और मंत्र-स्वर की लहरियां संपूर्ण आकाश मंडल में प्रवाहित होकर प्रभाव डालती हैं। मंत्र के चित्र या श्री विग्रह भी होते हैं। मंत्रर्थ न जानते हुए या अज्ञानी होते हुए भी यांत्रिक ढंग से जप करने पर भी वैज्ञानिक आधारों पर मंत्र से संबंधित स्वरूप साधक के अंत:करण में प्रविष्ट होकर आत्म प्रकाश फैलाएगा। मंत्र जप तीन प्रकार का होता है। वैखरी अर्थात् स्फुट उच्चारण करके, उपांशु अर्थात बहुत हल्केस्वर से अर्थात जिसे दूसरा न सुन-समझ सके और मानसिक, जो अंदर ही अंदर चले। जप में ज्यो-ज्यों आगे बढ़ते जाएंगे, ध्यान की सघनता और आराध्य में संलग्नता बढ़ती जाएगी और कालांतर में अविरल ध्यान ही चलेगा, जो समाधि या ब्राह्मी स्थिति में परिवर्तित हो जाएगा। साध्य प्राप्त हो जाने पर साधन के उपयोग की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी। दूसरे शब्दों में कहें तो ऐसी स्थिति में मंत्र की विशेष उपयोगिता नहीं रह जाती है। गीता के दशम अध्याय में अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि यज्ञों में मैं जपयज्ञ हूं। वीर शिवाजी के गुरु रामदास को आध्यात्मिक ऊंचाइयां श्रीराम जयराम जय जय राम के जप से मिलीं, जिसे उन्होंने गोदावरी के जल में खड़े होकर तेरह करोड़ बार जपा। स्पष्ट है कि जप की महत्ता अनिर्वचनीय और लोक हितकारी है। जिसने भी जप का महत्व समझ लिया और अपने तथा लोक के कल्याण के लिए इसका सहारा लिया उसे इसका लाभ मिलना तय है। रघोत्तम शुक्ल http://epaper.jagran.com/ePaperArticle/23-apr-2013-edition-Delhi-City-page_8-16555-104940208-4.html(यह आलेख दैनिक जागरण में दिनांक 23 अप्रैल 2013 को प्रकाशित हुआ । )

Tuesday, 15 January 2013

सदाचार और विचार

सदाचार और विचार सत् अव्यय को आधार से युक्त करने पर सदाचार बनता है। जिसका अर्थ है अच्छा आचरण और व्यवहार। इसकी महत्ता सभी धर्मों में स्वीकार की गई है। मानव सभ्यता के आदिग्रंथ वेदों में भी सदाचार की महिमा, गुण और प्रभाव का विपुल भंडार है। त्रग्वेद के दशम मंडल में सप्त मर्यादाओं का उल्लेख है-हिंसा, चोरी, व्यभिचार, मद्यपान, जुआ, असत्य भाषण तथा पाप-सहायक दुष्ट। सप्तम मंडल में श्रुति कहती है कि हे मनुष्य, तू साहसी बनकर गरुड़ के समान घमंड, गीध के समान लोभ, चकवे के समान काम, श्वान के समान मत्सर, उलूक के समान मोह और भेड़िये के समान क्रोध को समझकर उन्हें मार भगा। नीति ग्रंथों में सदाचार के तेरह मूल सूत्र वर्णित हैं-अभय, मुदुता, सत्य, आर्जव, करुणा, धृति, अनासक्ति, स्वावलम्बन, स्वशासन, सहिष्णुता, कर्तव्यनिष्ठा, व्यक्तिगत संग्रह, संयम और प्रामाणिकता। श्रुति में सदाचार के तीन आधार स्तंभ कहे गए हैं- अदम्यता, सुकर्म और पवित्रता। स्मृतिकार हारीत ने इसके तेरह भेद बताए हैं- ब्रह्मण्यता, देवपितृभक्ति, सौम्यता, दूसरों को न सताना, अनुसूयता, मृदुता, कठोर न होना, मैत्री, मधुर भाषण, कृतज्ञता, शरण्यता, कारुण्य और प्रशांति। बौद्ध धर्म के पंद्रह सदाचार हैं। जैन धर्म में परमानंद की प्राप्ति के तीन साधन हैं-सद्विश्वास सत् ज्ञान तथा सदाचरण। मनु स्मृति के अनुसार सदाचार से कभी न नष्ट होने वाला धन प्राप्त होता है तथा शुभ लक्षणों से हीन होने पर भी सदाचारी शतायु होता है। आचार का जन्म विचार से होता है। मन संकल्प विकल्प करता रहता है। प्रयत्नशील इंद्रियां चंचल विचरण करती हैं। मन में शुद्ध विचार से उठने वाली तरंगों से शुभ कमों और सदाचार का जन्म होगा। ऋग्वेद की प्रार्थना है आ नो भद्रा: क्रतवो यन्तु विश्वत: अर्थात हममे सब ओर से शुभ विचारों का आगमन हो। इसका परिणाम सदाचार तथा विश्व से विश्व मानव के कल्याण का पथ प्रशस्त होगा। - रघोत्तम शुक्ल ये लेख दैनिक जागरण में दिनांक 15 जनवरी 2013 को संपादकीय पेज पर प्रकाशित हुआ । http://epaper.jagran.com/ePaperArticle/15-jan-2013-edition-Delhi-City-page_8-4681-134900416-4.html

Monday, 12 November 2012

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं

शुभ हो दीपावली आपको , जीवन सब विधि सफल महान । श्री संम्पन्न करें मां लक्ष्मी , श्री गणेश पथ ज्योतिर्मान ।। सभी मित्रों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं....

Sunday, 14 October 2012

कर्म और भाग्य

सृष्टि में कर्म प्रधान है या भाग्य, यह जिज्ञासा प्राय: मानव में बनी रहती है, क्योंकि बहुधा शुभ कर्मकर्ता कष्ट सहते, दुखी और पाप कर्मरत जीव सुखी दिखाई पड़ते हैं। मनीषियों ने कर्म प्रधान विस्व रचि राखा और करम गति टारे नाहिं टरी भी लिखा तथा होइहइ सोइ जो रामरचि राखा तथा विधाता के भाग्य लेख की भी बात लिखी है। सच क्या है? वास्तव में यह विरोधाभास दृश्यमान मात्र है और भ्रम भी है। जगत कर्म प्रधान ही है और मानव तन कर्म से ही निर्मित है। कर्म के तीन स्तर है 1. संचित, 2. प्रारब्ध और 3. क्रियमाण। असंख्य जन्मों में किए कर्म संचित के रूप में सदा जीव के साथ संलग्न रहते हैं और देहांतर पर सूक्ष्म शरीर के साथ संस्कार रूप में विराजमान रहते हैं। कर्म सामान्यत: भोगने से ही कटते या क्षय होते हैं। किसी जन्म विशेष में संचित का जो अंश प्राणी भोगता है उसे प्रारब्ध या भाग्य कहते हैं तथा वर्तमान में किया जाने वाले कर्म क्रियमाण कहलाता है जो सामान्यतया संचित में जुड़ता है और उत्कट क्रियमाण तात्कालिक फलदायी भी होता है। जब अच्छे कर्म करते बुरे भोग मिलें तो समझिए कि प्रारब्ध वश कोई जन्मांतर का पाप कर्म हम भोग रहे हैं और पाप कर्मरत सुखी दिखाई पड़े तो समझिये कि वह पूर्व जन्मों के पुण्य भोग रहा है। कर्मो का क्षय या तो भोग से होगा या ज्ञानाग्नि से उन्हें दग्ध किया जा सकता है। कर्म शुभ, अशुभ और मिश्रित होते हैं। आद्य शंकराचार्य के अनुसार मैं ब्रम्ह हूं ऐसा ज्ञान होते की करोड़ों कल्पों के संचित कर्म नष्ट हो जाते हैं। ब्रम्ह और आत्मा की एकता जानने वाले तत्व ज्ञानी के पूर्व कर्म तो दग्ध हो ही जाते हैं, वह आगामी कर्मो अर्थात क्रियमाण से भी नहीं बंधता, क्योंकि वह निर्लिप्त भाव से उदासीनवत् कर्म कर रहा होता है और चलता फिरता साक्षात निर्गुण ब्रम्ह है। राज्य करते हुए भी राजा जनक का विदेह होना इसी स्थिति का द्योतक है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि हे अर्जुन! योग में स्थित रहकर, संग त्यागकर कर्म करते रहो। - रघोत्तम शुक्ल http://epaper.jagran.com/story1.aspx?id=17990&boxid=108144920&ed_date=12-oct-2012&ed_code=4&ed_page=10

Tuesday, 14 August 2012

देशगान

सकल वसुधा का है शिर मौर ,हमारा प्यारा भारत देश ।
जगत के शैल वर्ग में श्रेष्ठ तुहिनगिरि प्रहरी तुल्य विराट ।
अड़ा है अपना ताने वक्ष खड़ा है उन्नत किये ललाट । ।
यहां का तृण तृण है रमणीक,यहां का कण कण है अभिराम ।
इसे है कोटि नमन नतशीश इसे है बारम्बार प्रणाम ।।
धन्य रामेश्वर बदरीधाम स्वर्ग जिनके सम्मुख नि
:सार ।
धन्य गंगा की पावन धार मृतक तक का करती उद्धार ।।
महा महिमा गुण अकथ अशेष ,हमारा प्यारा भारत देश ।।1।।


यहीं पर हुए उशीनर राज हुए हैं यहीं दधीच समान ।
दिया परहित में अपना मांस किया निज अस्थि जाल भी दान । ।
अहा
! गौतम गांधी की गाथ न कोई कहीं जिन्हें था त्याज्य ।
अहिंसा,सत्य,प्रेम के स्रोत लोक हित त्यागा तन साम्राज्य ।।
हुए हैं त्यागी यहां असंख्य कथा है जिनकी अपरम्पार ।
एक साधारण पशु के हेतु प्राण तक देने को तैयार ।।
हुए जग विदित दिलीप नरेश ,हमारा प्यारा भारत देश ।।2।।


कहानी बल पौरुष की
'शुक्ल' सदा है अमिट अपार अमन्द ।
हमारे रण कौशल का गान किया करते वृन्दारक वृन्द ।।
अभी है बात पड़ोसी पर था अत्याचार ।
चला था दमनचक्र इस भांति निठुरता कहती थी
'धिक्कार'।।
लुटा ललनावों का श्रृंगार किया तब हमने रण हुंकार ।।
बजी तबतो रणभेरी खूब हुई बैरी की भारी हार ।।
नहीं पर अहंकार है लेश ,हमारा प्यारा भारत देश ।।3।।


धन्य यह धरती परम पुनीत ,धन्य काशी,अजमेर,प्रयाग ।
यहीं पर हो अपना हर जन्म रहे इसकी रज से अनुराग ।।
धन्य भारत के श्रमिक, किसान,धन्य भारत के वीर जवान ।
धन्य ईश्वर अल्ला के नाम,धन्य हैं वेद, पुरान, कुरान ।।
हमें प्रिय है इसका जलवायु हमें इसकी मिट्टी से प्यार ।
न केवल हमी इसे नतमाथ इसे तो झुकता है संसार ।।
सुयश गाते हैं शारद शेष.हमारा प्यारा भारत देश ।।4।।
- रघोत्तम शुक्ल